दिल्ली
एक घंटा पहले
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विचारों
डिजिटल दौर में साइबर ठगी और हनीट्रैप के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन दिल्ली की एक अदालत में सामने आए एक चौंकाने वाले मामले ने न्यायपालिका को भी हैरान कर दिया है। एक महिला न्यायिक अधिकारी डेटिंग ऐप टिंडर के जरिये हनीट्रैप का शिकार हो गईं और उन्होंने अपने 52.81 लाख रुपये गंवा दिए। मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि शिकायत दर्ज कराने की बारी आई तो समाज में बदनामी और पेशेवर संवेदनशीलता के डर से जज ने खुद सामने आने के बजाय अपनी घरेलू सहायिका के नाम पर एफआईआर दर्ज करा दी।
अदालत में कैसे खुला पूरा मामला
यह हाई-प्रोफाइल प्रकरण तब उजागर हुआ जब दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह लालेर ने आरोपी दीपक वत्स की जमानत याचिका पर सुनवाई की। 9 जून को दिए अपने आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया कि शिकायत भले ही नौकरानी दीक्षा देवी के नाम पर दर्ज है, लेकिन असल पीड़ित और शिकायतकर्ता कोई और नहीं, बल्कि हरियाणा की एक महिला जज हैं।
कोर्ट ने इस पर गहरी चिंता और नाराजगी जताते हुए कहा कि जो न्यायिक अधिकारी दूसरों को न्याय देने वाली कुर्सी पर बैठती हैं, उन्होंने स्वयं अदालत के समक्ष तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया और अपनी नौकरानी को ढाल के रूप में इस्तेमाल किया।
मामले की पांच प्रमुख बातें
- टिंडर से हुई शुरुआत: हरियाणा की महिला न्यायिक अधिकारी ने टिंडर पर ‘Altruistic Joy’ नाम से एक फर्जी प्रोफाइल बनाई थी। इसी के जरिये नवंबर 2025 में उनकी मुलाकात आरोपी दीपक वत्स से हुई और दोनों के बीच रोमांटिक रिश्ता बन गया।
- 52 लाख से अधिक की ठगी: आरोपी ने महिला जज को झांसे में लेकर गेमिंग और ऑनलाइन सट्टेबाजी के खातों में निवेश के नाम पर कुल 52,81,999 रुपये ट्रांसफर करवा लिए।
- नौकरानी के नाम का इस्तेमाल: ठगी का अहसास होते ही महिला जज ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में खुद शिकायत देने के बजाय अपनी घरेलू सहायिका दीक्षा देवी के नाम से एफआईआर दर्ज करवाई।
- चपरासी के जरिये नकद जमा: सभी बैंक लेन-देन जज के अपने खातों से हुए, जबकि एक 5 लाख रुपये का नकद डिपॉजिट हरियाणा में तैनात कोर्ट के चपरासी के जरिये कराया गया, जिसे नौकरानी का पैसा बताया गया था।
- जमानत याचिका खारिज: अदालत ने दीपक वत्स की जमानत याचिका पूरी तरह खारिज कर दी, क्योंकि उसने जांच में सहयोग नहीं किया, अपने फोन का पासवर्ड नहीं दिया और उसके खातों में 52 लाख रुपये से अधिक की रकम पाई गई।
नैतिक और प्रक्रियात्मक सवाल
यह केवल एक साधारण साइबर ठगी या हनीट्रैप का वाकया भर नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका के नैतिक और प्रक्रियात्मक सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अदालत ने अपने 24 पन्नों के आदेश में बेहद अहम टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने स्वीकार किया कि एक न्यायिक अधिकारी के लिए हनीट्रैप जैसे जाल में फंसना व्यक्तिगत रूप से बेहद शर्मनाक और पेशेवर रूप से संवेदनशील हो सकता है, लेकिन इस व्यक्तिगत असुविधा के नाम पर किसी आपराधिक जांच की सच्चाई और अखंडता से समझौता नहीं किया जा सकता।
अदालत ने टिप्पणी की कि कानून की नजर में हर नागरिक बराबर है, और जब एक जज ही कानून के सामने सीधे आने के बजाय अप्रत्यक्ष रास्ता अपनाती हैं तो इससे पूरी जांच प्रणाली की साख धूमिल होती है।
जांच पर भी कोर्ट की तीखी टिप्पणी
अदालत ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की जांच पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट के अनुसार, जांच अधिकारी ने टिंडर डेटा, व्हाट्सएप चैट या कॉल रिकॉर्ड जैसी किसी स्वतंत्र इलेक्ट्रॉनिक पड़ताल के बिना ही आंख मूंदकर नौकरानी की शिकायत को सच मान लिया, जबकि डिजिटल मनी ट्रेल साफ तौर पर महिला जज के बैंक खातों की ओर इशारा कर रहा था।
आरोपी दीपक वत्स का आचरण भी पूरी तरह संदिग्ध रहा। उसने व्हाट्सएप के केवल एकतरफा चैट पेश किए, जिनमें सिर्फ जज के संदेश थे, उसके अपने नहीं। साथ ही उसने अपने फोन का पासवर्ड न देकर सबूत छुपाने की कोशिश की, जिसके चलते अदालत ने उसे किसी राहत का हकदार नहीं माना।
नौकरानी के दावे झूठे क्यों माने गए
बैंक रिकॉर्ड की पड़ताल में सामने आया कि पूरे दौर में घरेलू सहायिका दीक्षा देवी के खाते से एक भी डिजिटल भुगतान नहीं हुआ। सभी लेन-देन सीधे महिला जज के खातों से किए गए। वहीं, जिन 5 लाख रुपये को नौकरानी की बचत बताया गया था, उन्हें असल में जज के कोर्ट चपरासी ने जमा किया था, जो किसी नौकरानी के लिए कमाना व्यावहारिक रूप से असंभव था।
पीड़ित जज को अदालत की सलाह
अदालत ने गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि न्याय के सिद्धांत पर चलने वाली अधिकारी को स्वयं सामने आना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि महिला जज को अपनी व्यक्तिगत असहजता को दरकिनार कर जल्द से जल्द जांच अधिकारी या मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होकर बिना किसी लाग-लपेट के पूरी सच्चाई रिकॉर्ड पर रखनी चाहिए।
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