हैदराबाद के इस शख्स के पास है सिक्कों का अनोखा खजाना, 1818 की ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर निज़ाम काल तक का इतिहास सहेज रहे भारत एक घंटा पहले 6
हैदराबाद में रहने वाले एक शख्स पिछले 22 वर्षों से ऐतिहासिक और दुर्लभ सिक्कों का संग्रह कर रहे हैं। उनके इस अनोखे खजाने में ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर से लेकर निज़ाम काल की अनूठी मुद्राएं शामिल हैं।

हैदराबाद की आधुनिकता और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच पुराने शहर की ऐतिहासिक गलियों में आज भी अतीत की एक बेहद खूबसूरत दुनिया सांस ले रही है। शहर के एक व्यस्त कोने पर एक ऐसा शख्स बैठता है, जो पिछले 22 सालों से लगातार ऐतिहासिक सिक्कों के जरिए बीते हुए कल को जीवित रखने का काम कर रहा है। यह कोई बहुत बड़ा सरकारी संग्रहालय नहीं है, बल्कि सड़क के किनारे सजी पुरानी और दुर्लभ मुद्राओं की एक छोटी सी, मगर बेहद अनूठी दुनिया है। इस संग्रह में 1818 के ईस्ट इंडिया कंपनी के खास टोकन सिक्कों से लेकर हैदराबाद के ऐतिहासिक निज़ाम शासनकाल की दुर्लभ मुद्राएं और हाथों से निर्मित पुराना 'मुद्दा पैसा' शामिल है, जिसे देखकर इतिहास के पन्ने खुद-ब-खुद जीवंत हो उठते हैं।

निज़ाम कालीन 'मुद्दा पैसा' और अशर्फी का अनोखा इतिहास

इस संग्रहकर्ता के पास इतिहास की कई ऐसी अनसुनी और बेहद दिलचस्प जानकारियां हैं, जिन्हें सुनकर कोई भी हैरान रह जाए। वे बताते हैं कि निज़ाम शासनकाल और उससे भी पुराने दौर में इन सिक्कों का निर्माण मशीनों से नहीं बल्कि कुशल कारीगरों द्वारा हाथों से किया जाता था। उनके संग्रह में मुख्य आकर्षण का केंद्र तांबे से बना हाथ का हस्तनिर्मित सिक्का है, जिसे पुराने समय में 'मुद्दा पैसा' के नाम से पुकारा जाता था। इतिहास की इसी रोचकता को समझाते हुए वे आगे बताते हैं कि यदि पुराने दौर में यह हस्तनिर्मित सिक्का शुद्ध सोने का बना होता था, तो समाज में इसे 'अशर्फी' का नाम दिया जाता था। वहीं, इसके विपरीत यदि इसी हस्तनिर्मित सिक्के का निर्माण चांदी की धातु से किया जाता था, तो इसे 'रुपया' कहा जाता था।

उनके इस ऐतिहासिक खजाने में तांबे का मुद्दा पैसा तो मौजूद है ही, साथ ही ब्रिटिश शासनकाल की कई अनमोल कड़ियां भी शामिल हैं। इनमें आजादी के ठीक बाद के समय का ब्रिटिश इंडिया का प्रसिद्ध हाफ पैसा (आधा पैसा) और विश्व के कई अन्य देशों की दुर्लभ विदेशी मुद्राएं भी सजी हुई हैं। इन सिक्कों को देखना अतीत की गलियों में यात्रा करने जैसा सुखद अनुभव देता है।

साल 2005 से शुरू हुआ सिक्कों को सहेजने का सफर

लगभग वर्ष 2005 से इस ऐतिहासिक काम में पूरी शिद्दत से जुटे इस संग्रहकर्ता का मानना है कि सिक्कों को एकत्रित करना केवल समय बिताने का एक जरिया नहीं है, बल्कि यह दुनिया की सबसे बेहतरीन और गरिमामयी आदतों में से एक है। वे इसे केवल एक साधारण शौक नहीं मानते, बल्कि बिना किसी नुकसान वाले एक सुरक्षित निवेश के तौर पर देखते हैं। उनका साफ तौर पर कहना है कि सिक्कों के इस अनूठे संग्रह के काम में कभी भी किसी व्यक्ति को कोई आर्थिक नुकसान नहीं उठाना पड़ता है।

इस बात को विस्तार से समझाते हुए वे कहते हैं कि जब आप ऐतिहासिक सिक्कों को बहुत संभालकर अपने पास रखते हैं, तो वक्त गुजरने के साथ-साथ इनकी ऐतिहासिक और बाजारू कीमत लगातार बढ़ती जाती है। भविष्य में यदि कभी किसी भी प्रकार की आकस्मिक वित्तीय आवश्यकता या संकट आ खड़ा हो, तो इन दुर्लभ मुद्राओं को सम्मानजनक कीमतों पर बेचकर अपनी आर्थिक जरूरतों को बेहद आसानी से पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार, यह शौक इतिहास की सुरक्षा के साथ-साथ एक बेहतरीन गुल्लक की तरह भी काम करता है।

आज की युवा पीढ़ी के लिए एक बड़ा और सकारात्मक संदेश

आज के इस आधुनिक और डिजिटल युग में जहां देश की नई पीढ़ी और युवा कई बार भटकाव का शिकार होकर गलत रास्तों पर चले जाते हैं, वहीं यह व्यक्ति अपनी इस अनूठी जीवनशैली से युवाओं के लिए एक बहुत बड़ा सकारात्मक संदेश दे रहा है। उनका कहना है कि आजकल के बच्चों और किशोरों ने सिगरेट पीने जैसी बेहद नुकसानदेह, खर्चीली और स्वास्थ्य को बर्बाद करने वाली आदतों को अपना शौक घोषित कर रखा है। इसके बिल्कुल विपरीत, पुराने और ऐतिहासिक सिक्कों को जमा करने की यह आदत एक अत्यंत ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद शौक है।

वे बताते हैं कि जब कोई युवा इन पुराने सिक्कों को संजोने की शुरुआत करता है, तो वह केवल धातु के टुकड़ों को ही नहीं सहेजता, बल्कि वह उस खास कालखंड के इतिहास, वहां की तत्कालीन राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था तथा सांस्कृतिक ताने-बाने को बहुत करीब से जानने और समझने लगता है। यह एक ऐसी सकारात्मक आदत है जो युवाओं को भटकाव से बचाकर ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। यह कहानी केवल एक सड़क किनारे बिकने वाले सिक्कों की नहीं है, बल्कि अपनी समृद्ध विरासत को सहेजने और आने वाली पीढ़ी को एक नई दिशा दिखाने की एक अद्भुत मिसाल है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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