भीषण गर्मी और मौसम के बदलते मिजाज से बेहाल हुए पशु, दूध उत्पादन और प्रजनन क्षमता पर पड़ रहा बुरा असर; जानें बचाव के उपाय बिहार एक महीने पहले 47
सीतामढ़ी में बढ़ते तापमान और उमस के कारण मवेशी हीटस्ट्रेस का शिकार हो रहे हैं, जिससे दूध उत्पादन घटने के साथ-साथ उनकी प्रजनन क्षमता भी प्रभावित हो रही है।

बिहार के सीतामढ़ी जिले में मौसम के बदलते मिजाज और लगातार बढ़ती तपिश ने केवल इंसानों को ही नहीं, बल्कि बेजुबान पशुओं को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। इस बेमौसम बदलाव और अत्यधिक ऊंचे तापमान के कारण मवेशियों की दूध देने की क्षमता में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। इस समस्या ने क्षेत्र के पशुपालकों और डेयरी व्यवसाय से जुड़े लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। विशेष रूप से गायों और भैंसों पर इस मौसम का सबसे ज्यादा प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल रहा है, जिससे दूध का उत्पादन काफी कम हो गया है और पशुपालकों के सामने अपनी आजीविका का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

गर्मी और उमस से बीमार हो रहे पशु, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

कृषि विज्ञान केंद्र के जाने-माने पशुपालक वैज्ञानिक किंकर कुमार के अनुसार, इस साल अगस्त और सितंबर के महीनों में सामान्य से बहुत कम बारिश हुई है। बारिश की इस भारी कमी के कारण पशुओं में आमतौर पर होने वाली बरसाती बीमारियों का प्रकोप तो इस बार कम रहा, लेकिन इसके बदले अत्यधिक तापमान और उमस ने एक नई और अधिक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है, जिसे हीटस्ट्रेस यानी गर्मी का तनाव कहा जाता है। वैज्ञानिक का कहना है कि यह हीटस्ट्रेस पशुओं के स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हो रहा है। इसका सबसे बुरा असर भैंसों पर देखा जा रहा है, जिससे उनके शरीर का सामान्य विकास पूरी तरह से बाधित हो गया है। इसके अलावा, बकरियों की शारीरिक ग्रोथ और उनके वजन बढ़ने की रफ्तार पर भी इसका बेहद नकारात्मक असर पड़ा है।

प्रजनन क्षमता पर गहरा आघात, समय पर गर्भधारण में आ रही दिक्कतें

यह बढ़ता हुआ तापमान सिर्फ मवेशियों के दूध उत्पादन को ही नहीं घटा रहा है, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। आमतौर पर देखा जाए तो सितंबर से लेकर फरवरी तक का समय पशुओं के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। यही वह मुख्य दौर होता है जब मवेशी हीट में आते हैं और उनका गर्भधारण कराया जाता है। लेकिन इस बार अत्यधिक गर्मी और हीटस्ट्रेस के चलते भैंसें समय पर हीट में नहीं आ पा रही हैं। इस वजह से वे गर्भधारण नहीं कर पा रही हैं, जो पशुपालकों के लिए आने वाले समय में एक नई और बेहद जटिल समस्या का रूप ले रही है। अगर पशु समय पर गर्भधारण नहीं करेंगे, तो आगे चलकर डेयरी उद्योग को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

बचाव के लिए अपनाएं वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीके

इस संकटपूर्ण स्थिति से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने पशुपालकों को विशेष सावधानी बरतने और मवेशियों के उचित रखरखाव को लेकर कुछ बेहद महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। पशुपालक अपने मवेशियों को इस भीषण गर्मी के प्रकोप से बचाने के लिए निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रख सकते हैं:

  • हवादार और ठंडे शेड की व्यवस्था: पशुओं को सीधी और तेज धूप से बचाना बेहद जरूरी है। इसके लिए उन्हें ऐसे शेड या बाड़े में रखें जहां हवा का आवागमन बेहतर हो और सीधे धूप न आती हो।
  • साफ और ठंडे पानी की उपलब्धता: भीषण गर्मी के दौरान मवेशियों के शरीर में पानी की कमी न होने दें। उन्हें दिन भर में कम से कम तीन से चार बार पूरी तरह साफ और ठंडा पानी पीने के लिए जरूर देना चाहिए।
  • पौष्टिक आहार की मात्रा बढ़ाएं: पशुओं के आहार में पौष्टिक तत्वों और हरे चारे की मात्रा बढ़ाएं। संतुलित पशु आहार देने से उनके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी और वे गर्मी के तनाव को आसानी से झेल सकेंगे, जिससे उनका दूध उत्पादन और प्रजनन क्षमता सामान्य स्तर पर वापस आ सकेगी।
अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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