उत्तराखंड
एक घंटा पहले
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गंगा के तट पर ब्रिटिश वास्तुकला का गौरव
उत्तराखंड के हरिद्वार में हर की पैड़ी के समीप स्थित विष्णु घाट का पुल ब्रिटिशकालीन इंजीनियरिंग का एक ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसने समय की हर चुनौती को मात दी है। वर्ष 1854 में निर्मित यह पुल आज अपनी स्थापना के 172 साल पूरे कर चुका है और आज भी पूरी तरह सुरक्षित व सुदृढ़ अवस्था में है। यह पुल चूना, सुर्खी और उस समय की विशेष निर्माण तकनीकों का मेल है, जिसने आज के कंक्रीट युग में भी अपनी पहचान कायम रखी है।
नहर परियोजना और सर प्रोबी थॉमस कॉटले का विजन
उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान ऊपरी गंगा नहर की रूपरेखा तैयार की गई थी। इस विशाल परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य हरिद्वार से लेकर कानपुर देहात तक एक विस्तृत सिंचाई तंत्र का निर्माण करना था। तत्कालीन ब्रिटिश इंजीनियर सर प्रोबी थॉमस कॉटले के नेतृत्व में 1842 में इस परियोजना का काम शुरू हुआ। लगभग 12 वर्षों की निरंतर मेहनत और तमाम भौगोलिक चुनौतियों का सामना करने के बाद, 1854 में यह नहर बनकर तैयार हुई। इस परियोजना का औपचारिक शुभारंभ तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के हाथों संपन्न हुआ था।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और निर्माण तकनीक
विष्णु घाट का यह पुल ऐतिहासिक हाथी पुल के निकट स्थित है और अपनी मेहराबदार बनावट के लिए जाना जाता है। इसे लाल ईंटों, चूने और सुर्खी के मिश्रण से इस प्रकार तैयार किया गया था कि यह गंगा की तेज जलधारा और दबाव को आसानी से झेल सके। इंजीनियरों ने इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ढाला था, जिसका परिणाम यह है कि आज भी इसके पिलर और मेहराब मजबूती से खड़े हैं। आधुनिक कंक्रीट के पुलों को जहां कुछ ही दशकों में मरम्मत की आवश्यकता पड़ती है, वहीं यह पुल सदियों बाद भी अपनी मूल संरचना के साथ अडिग है।
वाहनों का निषेध: लंबी उम्र का मुख्य रहस्य
इस पुल की दीर्घायु का सबसे बड़ा कारण इस पर वाहनों का पूर्ण प्रतिबंध होना है। पुल के मुहाने पर विशेष सीढ़ियां बनाई गई हैं और प्रवेश द्वार पर लगभग तीन-तीन फीट ऊंचे लोहे के मजबूत पिलर स्थापित किए गए हैं। इन पिलरों के कारण कोई भी दोपहिया या चारपहिया वाहन पुल के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता। केवल पैदल यात्रियों के आवागमन के कारण ही पुल के आंतरिक ढांचे पर कभी अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ा है, जिससे इसकी आयु और स्थायित्व सुरक्षित रहा है।
श्रद्धालुओं के लिए भरोसे का प्रतीक
प्रतिदिन देश-विदेश से आने वाले हजारों-लाखों श्रद्धालु, सैलानी और स्थानीय लोग इसी पुल के माध्यम से गंगा के एक तट से दूसरे तट तक आते-जाते हैं। भारी भीड़ और कांवड़ मेले के दौरान उमड़ने वाले जनसैलाब का दबाव झेलने के बावजूद, इस पुल पर चलने वाला हर व्यक्ति पूर्णतः सुरक्षित महसूस करता है। तकनीकी जानकारों और स्थानीय निवासियों का यह मानना है कि जिस प्रकार यह पुल गंगा के अविरल बहाव और बदलते मौसम की मार को सह रहा है, उससे स्पष्ट है कि यह अगले 100 वर्षों तक भी बिना किसी बाधा के अपनी सेवा जारी रखेगा।
आधुनिक इंजीनियरों के लिए शोध का केंद्र
आज के दौर के सीमेंट-कंक्रीट के पुलों की तुलना में ब्रिटिश काल का यह विष्णु घाट पुल एक जीती-जागती मिसाल है। इसमें इस्तेमाल किए गए जैविक तत्वों और चूने-सुर्खी का मिश्रण पानी के संपर्क में आने के साथ समय के साथ और अधिक कठोर हो गया है। 172 साल बीत जाने के बाद भी इसके जोड़ जस के तस बने हुए हैं, जो आधुनिक युग के इंजीनियरों के लिए एक शोध का विषय है।
इतिहास का एक अनूठा पन्ना
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के संग्रहालय अध्यक्ष मनोज कुमार के अनुसार, ऊपरी नहर और उस पर बने सभी पुलों का इतिहास बेहद रोचक है। उन्होंने बताया कि इस नहर की खुदाई सामान्य परंपरा के विपरीत हुई थी। उस समय नहर की खुदाई हरिद्वार से शुरू न होकर कानपुर देहात की तरफ से उल्टी दिशा में कराई गई थी। इस विपरीत खुदाई के कारण बाद में नहर में ढलान संबंधी समस्याओं का सामना भी करना पड़ा था।
धरोहर संरक्षण की आवश्यकता
इतिहासकार मनोज कुमार आगे कहते हैं कि 1854 में लोकार्पित यह पुल वास्तुकला की दृष्टि से एक अमूल्य धरोहर है। चूंकि इस पर वाहनों का पूर्ण प्रतिबंध है, इसलिए यह अन्य जर्जर पुलों की भांति संकटग्रस्त नहीं हुआ है। इस नायाब ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण किया जाना अनिवार्य है, ताकि इतिहास का यह महत्वपूर्ण दस्तावेज आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बना रह सके।
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