गुरुग्राम: IVF से जन्मे जुड़वां बच्चों का माता-पिता से नहीं मिला DNA, पांच महीने से अपनी संतान खोज रहा दंपति हरियाणा एक महीने पहले 29
गुरुग्राम के एक दंपति का दावा है कि आईवीएफ से जन्मे उनके जुड़वां बच्चों का डीएनए न तो पिता और न ही मां से मैच हुआ। कोर्ट के आदेश पर मामला दर्ज हो चुका है और पुलिस जांच जारी है।

दिल्ली-एनसीआर से सामने आए एक मामले ने आईवीएफ प्रक्रिया और अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुग्राम में रहने वाले एक दंपति का दावा है कि आईवीएफ तकनीक के जरिए जन्मे उनके जुड़वां बच्चे दरअसल उनकी अपनी जैविक संतान हैं ही नहीं। दंपति का कहना है कि डीएनए टेस्ट में बच्चों का डीएनए न तो पिता से और न ही मां से मेल खाया। अब अदालत के आदेश पर मामला दर्ज हो चुका है और बीते पांच महीनों से यह परिवार अपने असली बच्चों की तलाश में भटक रहा है।

आईवीएफ से बने थे माता-पिता

गुरुग्राम के राहुल राठौर और उनकी पत्नी मीनू राठौर रियल एस्टेट कंपनी चलाते हैं। लंबे समय तक संतान न होने के बाद इस दंपति ने आईवीएफ तकनीक का सहारा लिया और इसी प्रक्रिया के जरिए दोनों माता-पिता बने थे। दंपति का आरोप है कि उन्होंने दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित एक आईवीएफ सेंटर में इलाज कराया था और बाद में द्वारका स्थित अस्पताल में जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ।

डीएनए रिपोर्ट ने झकझोर दिया

राहुल राठौर का दावा है कि बच्चों के जन्म के बाद जब डीएनए जांच कराई गई तो रिपोर्ट ने पूरे परिवार को हिला कर रख दिया। उनके मुताबिक रिपोर्ट के अनुसार दोनों बच्चे न तो उनके जैविक बच्चे हैं और न ही उनकी पत्नी के। इसके बाद से ही यह दंपति अस्पतालों, पुलिस और अदालत के चक्कर लगाने को मजबूर है।

परिवार का आरोप है कि शुरुआती महीनों में उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिसके चलते उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अदालत के आदेश के बाद ही पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच शुरू हुई। दंपति का मानना है कि इस पूरे प्रकरण में कहीं न कहीं भ्रूण या बच्चों की अदला-बदली हुई है।

उच्च स्तर पर हस्तक्षेप की मांग

राहुल राठौर का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में कई संस्थाओं और अधिकारियों को शिकायत दी है। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और दिल्ली सरकार से भी हस्तक्षेप की मांग की है। उनका आरोप है कि जब उन्होंने डीएनए जांच की मांग रखी तो शुरुआत में इसका विरोध किया गया, लेकिन बाद में रिपोर्ट आने पर मामला और गंभीर हो गया। दंपति का यह भी दावा है कि अदालत में पेश किए गए कुछ दस्तावेजों पर सवाल उठे हैं और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

सोशल मीडिया पर सुनाई आपबीती

राहुल राठौर का कहना है कि पांच महीने बीत जाने के बावजूद न तो उन्हें अपने बच्चों का पता चल पाया है और न ही मामले में कोई ठोस प्रगति दिख रही है। इसी वजह से उन्होंने अपनी बात सोशल मीडिया के जरिए देश के सामने रखने का फैसला किया। वायरल हो रहे वीडियो में राहुल और मीनू राठौर अपनी पूरी आपबीती बताते नजर आ रहे हैं।

दंपति का कहना है कि उन्हें यह तक नहीं पता कि कथित गड़बड़ी डिलीवरी के दौरान हुई या उससे पहले किसी चरण में। उन्होंने अस्पताल प्रबंधन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। राहुल राठौर का दावा है कि उनके पास कुछ बातचीत की रिकॉर्डिंग भी मौजूद है, जिन्हें उन्होंने जांच एजेंसियों और अदालत के समक्ष पेश किया है। बताया जा रहा है कि अदालत ने भी संबंधित रिकॉर्ड तलब किए हैं।

जांच के बाद ही खुलेगी सच्चाई

इन आरोपों पर संबंधित अस्पतालों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में पूरे मामले की सच्चाई जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी। फिलहाल सभी की नजर पुलिस जांच और अदालत की निगरानी में चल रही कार्रवाई पर टिकी है। गौर करने वाली बात यह है कि यह सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों का भी है जो आईवीएफ जैसी आधुनिक चिकित्सा तकनीकों पर भरोसा कर माता-पिता बनने का सपना देखते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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