राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
राजस्थान में बाघों का बढ़ता कुनबा
राजस्थान अब एक नए नाम 'बाघस्थान' के तौर पर अपनी पहचान बना रहा है। यह बात सुनने में थोड़ी अनोखी लग सकती है, लेकिन राज्य में बाघों की लगातार बढ़ती संख्या ने इसे हकीकत में बदल दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के मौके पर सामने आए ताजा आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान के पांच प्रमुख बाघ अभयारण्यों में बाघों की कुल संख्या 149 तक पहुंच गई है। यह उपलब्धि प्रदेश के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता को दर्शाती है। एक समय ऐसा भी था जब राजस्थान के जंगलों में केवल 18 से 20 बाघ ही बचे थे, लेकिन आज उनकी दहाड़ एक बार फिर राजस्थान की फिजाओं में गूंज रही है।
संरक्षण के सामने खड़ी चुनौतियां
बाघों की बढ़ती संख्या निश्चित रूप से सुखद है, लेकिन इसके साथ ही संरक्षण की राह में नई चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। अब सबसे बड़ा सवाल बाघों के लिए सुरक्षित और पर्याप्त आवास उपलब्ध कराने का है। साथ ही, नए क्षेत्रों को विकसित करने की आवश्यकता है। जंगलों के भीतर बसे गांवों का नियोजित विस्थापन अब प्राथमिकता बन गया है। जानकारों का कहना है कि अगर बाघों की इस बढ़ती आबादी को सुरक्षित रखना है, तो वन प्रबंधन की रणनीति को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से बदलना होगा।
आंकड़ों की जुबानी: 149 तक पहुंचा आंकड़ा
रणथम्भौर, सरिस्का, धौलपुर-करौली, मुकुंदरा हिल्स और रामगढ़ विषधारी अभयारण्यों में बाघ, बाघिन और उनके शावकों की कुल संख्या अब 149 दर्ज की गई है, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 135 थी। मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के.सी. अरुण प्रसाद के अनुसार, इस वर्ष इन पांचों अभयारण्यों में 54 बाघिनों ने 53 शावकों को जन्म देने में सफलता पाई है। तुलनात्मक रूप से देखें तो वर्ष 2025 में 52 बाघिनों ने 43 शावकों को जन्म दिया था। इस साल का सबसे बड़ा आकर्षण सरिस्का बाघ अभयारण्य रहा, जहां अकेले 28 शावकों का जन्म हुआ है।
रणथम्भौर की बादशाहत बरकरार
राजस्थान में सबसे अधिक बाघों वाला क्षेत्र रणथम्भौर है, जहां बाघों की संख्या 66 से बढ़कर 72 तक पहुंच गई है। वहीं, सरिस्का का कुनबा भी 50 से बढ़कर 56 हो गया है। पारिस्थितिकी तंत्र के जानकारों का मानना है कि बाघों की संख्या में यह इजाफा इस बात का प्रमाण है कि राजस्थान के जंगलों में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में किए जा रहे काम सही दिशा में हैं। बाघ वन पारिस्थितिकी तंत्र के शीर्ष शिकारी हैं और उनकी मौजूदगी जंगल के स्वास्थ्य का पैमाना मानी जाती है।
दो दशक का संघर्ष और बदलाव
लगभग बीस साल पहले राजस्थान में बाघों की स्थिति बेहद नाजुक थी और उनकी तादाद महज 18 से 20 के बीच सिमट कर रह गई थी। आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं और राजस्थान भारत के प्रमुख टाइगर राज्यों की सूची में मजबूती से खड़ा है। वर्तमान में पांचों अभयारण्यों में वयस्क बाघ और बाघिनों की संख्या 96 है, और शावकों को मिलाकर यह कुल संख्या 149 है। अकेले रणथम्भौर में लगभग 50 वयस्क और 22 शावक पल रहे हैं। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि रणथम्भौर बाघों के प्रजनन और उनके जीवित रहने की दर के मामले में देश के सबसे सफल केंद्रों में से एक है। साथ ही, यहां के शुष्क वन क्षेत्र में बाघों को देखना आसान होता है, इसलिए देशी-विदेशी सैलानियों के लिए यह पहली पसंद है।
रणथम्भौर की विशेषता
करीब 1,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले रणथम्भौर अभयारण्य में से लगभग 700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बाघों की सक्रिय मौजूदगी है। उपवन संरक्षक मानस सिंह बताते हैं कि यहाँ की सबसे बड़ी खूबी शाकाहारी वन्यजीवों की प्रचुरता है। सांभर और चीतल जैसे शिकार की पर्याप्त उपलब्धता और विकसित घास के मैदान बाघों के लिए अनुकूल स्थिति पैदा करते हैं। यहां बाघों की जीवित रहने की दर 80 प्रतिशत के करीब है, जो देश में सबसे बेहतरीन है।
मछली की विरासत और सरिस्का का पुनरुद्धार
रणथम्भौर की बाघ संरक्षण गाथा प्रसिद्ध बाघिन 'मछली' (टी-16) के बिना पूरी नहीं होती। उसने अपने दो दशक के जीवनकाल में 18 शावकों को जन्म दिया। उसके वंशजों ने न केवल रणथम्भौर, बल्कि सरिस्का, मुकुंदरा और रामगढ़ विषधारी जैसे क्षेत्रों को भी आबाद किया। वर्ष 2008 में जब सरिस्का बाघविहीन हो गया था, तब रणथम्भौर से बाघों को वहां ले जाकर बसाया गया था। 'मछली' के सम्मान में भारत सरकार ने 2013 में डाक टिकट निकाला था और जोगी महल में उसका स्मारक भी है। वन विभाग ने उसके नाम पर एक विशेष पुरस्कार भी शुरू किया है।
आवास का संकट और बाघों का विस्थापन
बाघों की बढ़ती संख्या ने वन विभाग को एक नई उलझन में डाल दिया है। रणथम्भौर की क्षमता 40 से 50 बाघों की मानी जाती है, जबकि यहां संख्या 72 हो गई है। एक वयस्क नर को 40 से 50 वर्ग किलोमीटर और बाघिन को करीब 20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की जरूरत होती है। यही वजह है कि तीन साल की उम्र के बाद युवा बाघ नए इलाके की तलाश में जंगल से बाहर निकलने पर मजबूर हो रहे हैं।
सुरक्षित आवास की भविष्य की आवश्यकता
वन्यजीव विशेषज्ञ धर्मेन्द्र खांडल के अनुसार, नए घर की तलाश में रणथम्भौर के बाघ मुकुंदरा हिल्स, रामगढ़ विषधारी और मध्य प्रदेश की सीमा तक पहुंच जाते हैं। उन्होंने जोर दिया कि अन्य अभयारण्यों से गांवों का विस्थापन अभी पूर्ण नहीं हुआ है। बाघों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए गांवों का नियोजित पुनर्वास और बेहतर वन प्रबंधन बहुत जरूरी है। खांडल का सुझाव है कि रणथम्भौर के अलावा कैलादेवी अभयारण्य को भी जल्द से जल्द बाघों के लिए पूरी तरह अनुकूल बनाने की दिशा में काम करना अनिवार्य है।
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