गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट से सिद्ध नहीं होती हिंदू शादी, पारंपरिक रस्में अनिवार्य गुजरात 2 महीने पहले 59
गुजरात हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल पंजीकरण के आधार पर हिंदू विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि सप्तपदी जैसी पारंपरिक रस्मों का पालन न होने पर शादी को वैध नहीं माना जा सकता है।

विवाह की वैधता के लिए रस्मों का महत्व

गुजरात हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह की वैधता केवल उसके पंजीकरण पर निर्भर नहीं करती है। अदालत ने अपने हालिया आदेश में कहा है कि यदि विवाह के दौरान सप्तपदी जैसी जरूरी पारंपरिक रस्में और रीति-रिवाज नहीं निभाए गए हैं, तो सिर्फ कागजी पंजीकरण के आधार पर उस विवाह को वैध करार नहीं दिया जा सकता। न्यायाधीशों ने अपने अवलोकन में कहा कि पारंपरिक समारोह और रस्में किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवन में बदलाव और शुद्धिकरण के लिए अनिवार्य हैं, जो कि अलग-अलग क्षेत्रों की संस्कृति के हिसाब से महत्वपूर्ण हैं। यह आदेश फैमिली कोर्ट द्वारा पिछले साल नवंबर में दिए गए एक फैसले को खारिज करते हुए आया है।

सप्तपदी का पालन न करने पर शादी अमान्य

यह पूरा मामला ब्रिटेन में निवासी कौशल सोनार की एक अपील से जुड़ा हुआ है। अपीलकर्ता ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी शादी को अमान्य घोषित करने की मांग को ठुकरा दिया गया था। न्यायाधीश इलेश वोरा और न्यायाधीश आर टी वाच्छानी की खंडपीठ ने इस केस की सुनवाई करते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार सप्तपदी जैसी रस्में इस पवित्र बंधन का आधार हैं और इनके बिना विवाह पूर्ण नहीं माना जा सकता।

क्या था विवाद का मुख्य बिंदु?

अपीलकर्ता कौशल सोनार ने कोर्ट को अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि उन्हें अपनी कथित शादी के बारे में तब जानकारी मिली जब एक महिला ने उनके माता-पिता से संपर्क साधा और एक मैरिज सर्टिफिकेट दिखाया। महिला का दावा था कि वह सोनार की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। इस पर सोनार ने साफ तौर पर कहा कि उन्होंने कभी भी उक्त महिला से शादी नहीं की, उनके बीच कभी कोई हिंदू रस्म नहीं निभाई गई और वे कभी भी पति-पत्नी के रूप में साथ नहीं रहे।

महिला ने भी स्वीकार की रस्मों की कमी

अदालत की कार्यवाही के दौरान एक हैरान कर देने वाला तथ्य सामने आया। स्वयं प्रतिवादी महिला ने फैमिली कोर्ट के समक्ष यह स्वीकार किया कि उनके और कौशल सोनार के बीच विवाह की कोई भी रस्म या समारोह आयोजित नहीं हुआ था। साथ ही, दोनों के बीच कभी भी वैवाहिक संबंध नहीं रहे। इसके बावजूद, हाई कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने इन तथ्यों को दरकिनार करते हुए सोनार की याचिका को खारिज कर बड़ी भूल की थी।

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा सात पर जोर

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय के समर्थन में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा सात का हवाला दिया। इस कानूनी प्रावधान के अनुसार, किसी भी विवाह को तब तक पूर्ण और बाध्यकारी नहीं माना जा सकता जब तक कि उसमें जरूरी पारंपरिक रस्में और समारोह शामिल न हों। चूंकि प्रस्तुत मामले में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी, इसलिए अदालत ने माना कि विवाह की बुनियादी और अनिवार्य शर्तों का अभाव है, जिसके चलते इस शादी को कानूनी रूप से मान्यता नहीं दी जा सकती।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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