उत्तर प्रदेश
2 घंटे पहले
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गोंडा जिले के विकासखंड मनकापुर के एक किसान ने परंपरागत फसलों की लीक से हटकर तरबूज की खेती को अपनाया और आज इसी फसल से बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं। उनकी इस कामयाबी ने आसपास के दूसरे किसानों के लिए भी एक मिसाल पेश कर दी है। किसान का कहना है कि कम समय में तैयार हो जाने वाली यह फसल अच्छे उत्पादन के साथ अच्छी कमाई भी देती है।
गेहूं-धान से तरबूज तक का सफर
प्रगतिशील किसान राजेश कुमार वर्मा ने बताया कि पहले वे गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलें ही उगाते थे, लेकिन बढ़ती लागत और कम मुनाफे को देखते हुए उन्होंने तरबूज की ओर रुख करने का फैसला किया। उन्होंने खेत की अच्छी जुताई की, आधुनिक कृषि तकनीकों का सहारा लिया और तरबूज की बुवाई की। समय पर सिंचाई और सही देखभाल के चलते फसल बेहद उम्दा तैयार हुई।
राजेश के मुताबिक तरबूज की खेती में मेहनत जरूर लगती है, पर वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो फायदा भी उतना ही अच्छा मिलता है। इस फसल से होने वाली उनकी आय पारंपरिक फसलों के मुकाबले कहीं ज्यादा है, यही वजह है कि अब वे हर साल अपने खेत के बड़े हिस्से में तरबूज लगा रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिक की सलाह बनी मोड़
राजेश ने बताया कि पहले वे पारंपरिक खेती करते थे, जिसमें लागत तो कम थी मगर मुनाफा भी बहुत कम मिलता था। इसके बाद मनकापुर के कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक राम लखन यादव ने उन्हें तरबूज की खेती के बारे में विस्तार से जानकारी दी। शुरुआत में उन्होंने थोड़ी जमीन पर ही तरबूज लगाया, जहां से अच्छा मुनाफा हुआ। फायदा देखते हुए उन्होंने धीरे-धीरे इसका रकबा बढ़ा दिया।
मल्चिंग विधि से बेहतर पैदावार
राजेश बताते हैं कि वे मल्चिंग विधि से तरबूज की खेती कर रहे हैं। इस तकनीक में फल सीधे मिट्टी के संपर्क में नहीं रहता और पानी की सतह पर होने के कारण तरबूज देखने में सुंदर लगता है, साथ ही रोग लगने की आशंका भी काफी घट जाती है।
सागर किंग किस्म की खासियत
राजेश के अनुसार इस समय वे सागर किंग वैरायटी के तरबूज की खेती कर रहे हैं। यह किस्म गोंडा के मौसम में अच्छी तरह ढल गई है, इसकी पैदावार भी अच्छी है, स्वाद में काफी मीठी है और अंदर से पूरी तरह लाल रहती है। वे बताते हैं कि तरबूज की यह फसल कुल 100 दिन की होती है और बुवाई के लगभग 60 दिन बाद फल आना शुरू हो जाता है।
खेत से ही हो जाती है बिक्री
गर्मी के मौसम में तरबूज की मांग काफी बढ़ जाती है, ऐसे में बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिल जाती है। राजेश का कहना है कि फसल तैयार होते ही व्यापारी सीधे खेत पर आकर खरीदारी कर लेते हैं, जिससे उपज बेचने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती। उनके मुताबिक तरबूज एक नगदी फसल है, जिसकी खेती सिर्फ गर्मी के मौसम में होती है और इन्हीं दिनों इसकी मांग सबसे ज्यादा रहती है। उन्हें खुद बाजार जाकर बेचने की जरूरत नहीं पड़ती, माल की सप्लाई खेत से ही हो जाती है।
लागत और कमाई का गणित
राजेश कुमार वर्मा ने बताया कि वे करीब 2 बीघा में तरबूज की खेती कर रहे हैं और इस पर तकरीबन 10 से 15000 रुपये तक की लागत आई है। फिलहाल तरबूज 12 से 13 रुपये प्रति किलो के भाव से बिक रहा है और उनके यहां से रोजाना करीब 5 क्विंटल तरबूज की बिक्री हो रही है। इस तरह उन्हें इस फसल से अच्छी-खासी आमदनी होने की उम्मीद है।
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