बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
बिहार के गया जिले के आमस प्रखंड से एक बेहद प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जो शिक्षा के महत्व और समाज के प्रति समर्पण को एक नए स्तर पर रेखांकित करती है। यहां के बहेरा गांव के निवासी धर्मेंद्र कुमार पिछले 25 वर्षों से समाज के बेहद गरीब और जरूरतमंद छात्र-छात्राओं के जीवन में उजाला फैला रहे हैं। धर्मेंद्र कुमार वर्तमान में एक सरकारी शिक्षक हैं, लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा मिशन गरीब युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। उनके इस नि:शुल्क मार्गदर्शन का ही नतीजा है कि अब तक इलाके के 84 छात्र-छात्राएं सरकारी नौकरियों में चयनित होकर अपने परिवारों का सहारा बन चुके हैं।
धर्मेंद्र कुमार की यह पाठशाला किसी व्यावसायिक कोचिंग संस्थान जैसी नहीं है, जहां भारी-भरकम फीस वसूली जाती है। सबसे खास बात यह है कि वे इन बच्चों को पढ़ाने के लिए एक भी रुपया फीस या गुरुदक्षिणा के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। इसके विपरीत, उन्होंने अपने छात्रों के सामने एक अनोखी और संवेदनशील शर्त रखी है, जिसने समाज में सकारात्मक बदलाव की एक नई श्रृंखला शुरू कर दी है।
नौकरी मिलने से पहले दूसरों को बनाया सरकारी सेवक
धर्मेंद्र कुमार की कहानी सिर्फ एक शिक्षक की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसे जुझारू व्यक्तित्व की गाथा है जिसने खुद बेरोजगार रहते हुए दर्जनों युवाओं का भविष्य संवार दिया। सरकारी सेवा में आने से पहले ही धर्मेंद्र कुमार ने 40 से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में सफलता दिला दी थी। आज वह स्वयं गया जिले के मध्य विद्यालय रेंगनिया में एक सरकारी शिक्षक के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन उनकी यह यात्रा आज से लगभग ढाई दशक पहले शुरू हुई थी।
साल 2000 से ही धर्मेंद्र कुमार ने अपने गांव और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के उन बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाना शुरू कर दिया था, जिनके परिवार कोचिंग की फीस देने में पूरी तरह असमर्थ थे। उनका एकमात्र उद्देश्य यह था कि आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को सही समय पर सही मार्गदर्शन मिल सके, ताकि वे प्रतियोगी परीक्षाओं की चुनौतियों का सामना कर सकें और एक सम्मानजनक सरकारी नौकरी हासिल कर सकें। आज भी वे अपने इस संकल्प पर पूरी दृढ़ता के साथ कायम हैं और बिना किसी स्वार्थ के बच्चों का भविष्य संवारने में जुटे हुए हैं।
साल 1999 की वह घटना, जिसने बदल दी जीवन की दिशा
धर्मेंद्र कुमार के इस असाधारण संकल्प के पीछे उनके जीवन की एक बेहद निजी और झकझोर देने वाली घटना है। यह बात साल 1999 की है, जब बिहार में बड़े पैमाने पर शिक्षकों की बहाली की प्रक्रिया चल रही थी। उस दौर में आज की तरह न तो हाई-स्पीड इंटरनेट था और न ही सूचनाओं के आदान-प्रदान का कोई मजबूत और त्वरित माध्यम था। ग्रामीण क्षेत्रों में समाचार पत्रों और सूचनाओं की पहुंच बहुत सीमित हुआ करती थी। इस सूचना तंत्र की कमजोरी के कारण धर्मेंद्र कुमार को समय पर इस शिक्षक बहाली भर्ती की कोई जानकारी नहीं मिल सकी।
परिणामस्वरूप, वह इस बहाली के लिए आवेदन करने से चूक गए। दूसरी ओर, उनके साथ पढ़ने वाले और उनके कई परिचितों को इस भर्ती की समय पर जानकारी मिल गई और उनका चयन सरकारी शिक्षक के रूप में हो गया। जानकारी के अभाव में एक बेहतरीन अवसर हाथ से निकल जाने के इस दर्द ने धर्मेंद्र कुमार को भीतर तक झकझोर दिया। इस घटना ने उनके जीवन की पूरी दिशा ही बदल दी। उन्होंने उसी समय एक कड़ा संकल्प लिया कि भविष्य में वह अपने क्षेत्र के किसी भी गरीब या ग्रामीण छात्र को केवल जानकारी और सही मार्गदर्शन के अभाव में नौकरी पाने के अवसर से वंचित नहीं होने देंगे। इसी दृढ़ संकल्प के साथ उन्होंने साल 2000 से ही गरीब बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करने का काम अपने हाथों में ले लिया।
बेरोजगारी के दिनों में भी नहीं छोड़ा दूसरों का साथ
धर्मेंद्र कुमार की मेहनत और बच्चों के प्रति उनका समर्पण धीरे-धीरे रंग लाने लगा। साल 2000 से शुरू हुआ यह सिलसिला लगातार आगे बढ़ता गया। वर्ष 2010 तक आते-आते उनके मार्गदर्शन में पढ़ने वाले 40 से अधिक छात्र सरकारी नौकरी हासिल कर चुके थे। केवल साल 2010 में ही एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब उनके पढ़ाए हुए करीब 30 छात्र-छात्राओं का चयन एक साथ विभिन्न सरकारी विभागों में हुआ। इनमें से कई बच्चों ने शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं शुरू कीं, तो कइयों का चयन अन्य सरकारी सेवाओं में हुआ।
इस पूरी अवधि के दौरान सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि धर्मेंद्र कुमार खुद बेरोजगार थे। वे किसी सरकारी नौकरी में नहीं थे और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए गांव में ही खेती-बाड़ी का काम करते थे। खुद आर्थिक तंगी और संघर्षों के दौर से गुजरते हुए भी उन्होंने कभी बच्चों को पढ़ाना बंद नहीं किया और न ही कभी उनसे पैसे लेने के बारे में सोचा। साल 2011 में, जब शिक्षक बहाली की नई प्रक्रिया शुरू हुई, तब उनके ही उन सफल छात्रों ने, जो अब सरकारी नौकरियों में थे, धर्मेंद्र कुमार को फॉर्म भरने के लिए प्रेरित और मजबूर किया। अपने छात्रों के भारी आग्रह पर उन्होंने फॉर्म भरा और पहली ही कोशिश में सफलता हासिल कर वे स्वयं सरकारी शिक्षक बन गए।
आज भी अनवरत जारी है शाम की विशेष पाठशाला
साल 2011-12 से धर्मेंद्र कुमार एक सरकारी शिक्षक के रूप में पूरी निष्ठा के साथ कार्यरत हैं। वर्तमान में वह मध्य विद्यालय रेंगनिया में बच्चों को ज्ञान बांट रहे हैं। स्कूल के समय में वे वहां के बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन स्कूल की छुट्टी होने के बाद उनकी एक और महत्वपूर्ण भूमिका शुरू होती है। वे रोज शाम को करीब सात बजे अपने गांव में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले गरीब छात्रों के लिए विशेष पाठशाला का आयोजन करते हैं।
वर्तमान समय में भी उनकी इस शाम की पाठशाला में प्रतिदिन 25 से 30 छात्र-छात्राएं नियमित रूप से पढ़ने आते हैं। उनके पढ़ाने की शैली इतनी सरल और प्रभावी है कि परीक्षा की तैयारी करने वाले कई छात्र अपने पहले ही प्रयास में कठिन से कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं को पास कर लेते हैं। धर्मेंद्र कुमार बच्चों को न केवल विषयों की गहरी समझ देते हैं, बल्कि उन्हें परीक्षा के समय तनाव से मुक्त रहने और सफलता प्राप्त करने के गुर भी सिखाते हैं।
गुरुदक्षिणा के स्थान पर रखी यह अनोखी शर्त
धर्मेंद्र कुमार के पास पढ़ने आने वाले हर छात्र के लिए एक बेहद अनूठी और अनिवार्य शर्त तय की गई है। वे किसी भी छात्र से पढ़ाई के बदले में न तो कोई मासिक फीस लेते हैं और न ही सफल होने के बाद किसी तरह की गुरुदक्षिणा स्वीकार करते हैं। उनकी शर्त बहुत साफ और सीधी है: "यदि आप मेरे मार्गदर्शन में पढ़ाई करके सरकारी नौकरी प्राप्त करते हैं, तो आपको भविष्य में अपने स्तर पर कम से कम तीन गरीब और जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई में निशुल्क मदद करनी होगी।"
उनकी शर्त के अनुसार, सफल छात्रों को उन जरूरतमंद बच्चों को गोद लेना होता है, उन्हें सही मार्गदर्शन देना होता है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में हर संभव सहायता प्रदान करनी होती है। धर्मेंद्र कुमार का मानना है कि इस तरह से समाज में मदद की एक ऐसी श्रृंखला तैयार होगी जो कभी नहीं टूटेगी। उनके संघर्ष के दिनों में उन्होंने जो संकल्प लिया था, यह शर्त उसी का हिस्सा है। वे कहते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी गुरुदक्षिणा यही है कि उनके पढ़ाए हुए बच्चे जब आत्मनिर्भर बनें, तो वे दूसरों का हाथ थामने में संकोच न करें।
समाज में आ रहा है एक बड़ा बदलाव
धर्मेंद्र कुमार की इस अनूठी पहल का असर अब जमीनी स्तर पर दिखने लगा है। उनके कई पुराने छात्र, जो आज विभिन्न सरकारी सेवाओं में ऊंचे पदों पर कार्यरत हैं, वे धर्मेंद्र कुमार की इस शर्त को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं। ये पूर्व छात्र आज अपने-अपने क्षेत्रों में गरीब बच्चों को नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी बिल्कुल मुफ्त में करा रहे हैं। इससे न केवल गरीब बच्चों का भविष्य संवर रहा है, बल्कि समाज में शिक्षा के प्रति एक सकारात्मक माहौल भी तैयार हो रहा है।
धर्मेंद्र कुमार अक्सर याद करते हैं कि साल 1999 की उस घटना ने उन्हें जीवन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सबक सिखाया था। उसी दिन उन्होंने तय कर लिया था कि वे जब भी नौकरी करेंगे, केवल एक शिक्षक के रूप में ही समाज की सेवा करेंगे। आज उनके मार्गदर्शन में 84 छात्र सरकारी नौकरियों में देश और राज्य की सेवा कर रहे हैं। स्थानीय लोगों और ग्रामीणों का कहना है कि धर्मेंद्र कुमार केवल एक शिक्षक नहीं हैं, बल्कि वे समाज के लिए एक महान मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत हैं। उनका यह नि:स्वार्थ समर्पण, सेवा की अद्भुत भावना और अनोखी गुरुदक्षिणा की शर्त आज सैकड़ों युवाओं की जिंदगी को एक नया आयाम दे रही है।
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