राष्ट्रीय राजनीति
2 घंटे पहले
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इंदौर कार्यक्रम और दावों का विश्लेषण
मध्य प्रदेश के इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर जमकर निशाना साधा और कई गंभीर दावे किए। हालांकि, उनके भाषण के तुरंत बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर 'झूठ की गूंज' नाम के एक पेज ने इन दावों की परतें उधेड़ते हुए एक तीखा फैक्ट-चेक पेश किया है। इस फैक्ट-चेक में एमपीपीएससी भर्ती, ओबीसी आरक्षण, अडानी समूह के साथ व्यापार, एनएसयूआई नेताओं की पहचान और एकलव्य स्कूलों से जुड़े आंकड़ों को आधार बनाकर राहुल गांधी के दावों को सवालों के घेरे में खड़ा किया गया है। आइए विस्तार से जानते हैं उन पांच प्रमुख दावों और उनके पीछे की असलियत के बारे में।
एमपीपीएससी भर्ती और 87:13 फॉर्मूले का सच
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में दावा किया था कि पिछले आठ वर्षों के दौरान मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की सभी भर्तियों में 13 प्रतिशत पदों को होल्ड पर रखा गया है, जिसके चलते कुल 4.87 लाख पद पेंडिंग पड़े हुए हैं। इस दावे के जवाब में फैक्ट-चेक रिपोर्ट में इसे पूरी तरह भ्रामक करार दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 87:13 का फॉर्मूला पिछले आठ वर्षों से लागू नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था 29 सितंबर 2022 को लागू की गई थी, यानी इसे लागू हुए अभी महज चार साल का समय हुआ है। यह विवाद 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत तक बढ़ाने के फैसले से शुरू हुआ था। नियुक्तियां मुख्य रूप से 87 प्रतिशत पदों पर जारी हैं और कानूनी पेच के चलते केवल लगभग 10,000 पद ही प्रभावित हुए हैं, न कि 4.87 लाख पद जैसा कि राहुल गांधी ने मंच से कहा था।
ओबीसी आरक्षण और 2019 के अध्यादेश का विवाद
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि 2019 में कांग्रेस सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का साहसी कदम उठाया था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अदालती आदेशों का हवाला देकर इसे रोक दिया। 'झूठ की गूंज' पेज ने इस दावे को गलत बताते हुए स्पष्ट किया कि आरक्षण पर रोक भाजपा सरकार ने नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने लगाई थी। यह घटना 19 मार्च 2019 को हुई थी, जब प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस की ही सरकार थी। तत्कालीन सरकार ने बिना कानूनी पहलुओं और प्रक्रियाओं को गहराई से समझे जल्दबाजी में नोटिफिकेशन जारी किया था, जिसके बाद कोर्ट ने कॉलेज दाखिलों में इस पर रोक लगा दी थी। बाद में 2021 में भाजपा सरकार ने अन्य भर्तियों में इस आरक्षण को कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए लागू भी किया था।
अडानी समूह और कांग्रेस शासित राज्यों का व्यापार
राहुल गांधी के दावों में सबसे चर्चित मुद्दा अडानी समूह का रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि अडानी समूह को मिलने वाले सरकारी ठेकों का सीधा संबंध केंद्र सरकार के साथ है और वे जनता का पैसा उनके माध्यम से भाजपा तक पहुंचाते हैं। फैक्ट-चेक रिपोर्ट में इस पर सवाल उठाया गया है कि यदि अडानी समूह के साथ सरकारी मिलीभगत का आरोप है, तो कांग्रेस शासित राज्य उनके साथ व्यापारिक समझौते क्यों कर रहे हैं? उदाहरण के तौर पर, कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने बेंगलुरु टनल-रोड प्रोजेक्ट में अडानी समूह को सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी माना है। इसके अलावा, तेलंगाना में कांग्रेस सरकार ने 12,400 करोड़ रुपये के एमओयू (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, और केरल में भी पोर्ट प्रोजेक्ट्स पर अडानी समूह के साथ काम जारी है। यह दोहरा मापदंड राहुल गांधी के बयानों की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े करता है।
छात्रों की पहचान का सवाल
कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने यह दावा किया था कि उन्होंने मंच पर केवल असली और परेशान छात्रों को आमंत्रित किया है ताकि उनकी समस्याओं को दुनिया के सामने रखा जा सके। लेकिन 'झूठ की गूंज' की छानबीन में कुछ अलग ही तस्वीर सामने आई। कार्यक्रम में छात्रों की आवाज बनकर मंच पर दिखे तनय शर्मा को एक गैर-राजनीतिक छात्र के रूप में पेश किया गया था। फैक्ट-चेक में पता चला कि तनय शर्मा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के छात्र होने के साथ-साथ एनएसयूआई (NSUI) के पूर्व राज्य प्रवक्ता भी रह चुके हैं। एक सक्रिय राजनीतिक पदाधिकारी को मंच पर एक सामान्य छात्र के तौर पर पेश करना यह दर्शाता है कि कार्यक्रम के दौरान वस्तुनिष्ठता के बजाय नैरेटिव बनाने पर अधिक जोर दिया गया था।
एकलव्य स्कूलों और आदिवासी शिक्षा का दावा
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि मोदी सरकार आदिवासियों को शिक्षा से वंचित रखना चाहती है ताकि वे केवल उनके समर्थक बनकर रहें। इस दावे को गलत बताते हुए फैक्ट-चेक रिपोर्ट में एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों (EMRS) के विस्तार के आंकड़े पेश किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2014-15 में देशभर में एकलव्य स्कूलों की संख्या 129 थी, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर 511 हो गई है। इसी तरह, इन आवासीय विद्यालयों में पढ़ने वाले आदिवासी छात्रों की संख्या भी 40,000 से बढ़कर अब 1.5 लाख तक पहुंच गई है। इसके अलावा, प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के जरिए लाखों आदिवासी विद्यार्थियों को शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता दी जा रही है। ये आंकड़े सरकारी प्रयासों की वास्तविकता को राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों से बिल्कुल अलग साबित करते हैं।
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