राष्ट्रीय राजनीति
2 घंटे पहले
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संसद के मानसून सत्र का समापन हो चुका है, लेकिन इसके साथ ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच का तनाव एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के रवैये पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने विपक्षी दलों पर संसद में सार्थक चर्चा से भागने का गंभीर आरोप लगाया है। रिजिजू ने मीडिया से बातचीत के दौरान अपनी गहरी निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि एक सांसद और मंत्री के रूप में उन्हें विपक्षी सांसदों के इस व्यवहार से बेहद दुख हुआ है। उनके अनुसार, अब देश की आम जनता भी यह सवाल पूछ रही है कि आखिर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और अन्य दल चर्चा से क्यों बच रहे हैं।
कामकाज में सफलता, लेकिन चर्चा के स्तर पर निराशा
संसदीय कार्य मंत्री ने मानसून सत्र के काम का लेखा-जोखा पेश करते हुए कहा कि इस सत्र को दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा जाना चाहिए। कामकाज के मोर्चे पर तो यह सत्र काफी हद तक सफल रहा, क्योंकि सरकार ने कुल 12 विधेयक संसद से पारित कराने में सफलता हासिल की। हालांकि, जब बात लोकतांत्रिक बहस और स्वस्थ चर्चा की आती है, तो यह सत्र बेहद निराशाजनक साबित हुआ। हंगामे और शोर-शराबे की वजह से सदन का बहुत सारा समय बर्बाद हो गया।
आंकड़ों का हवाला देते हुए किरेन रिजिजू ने बताया कि इस बार लोकसभा की उत्पादकता केवल 19 प्रतिशत ही रह गई। वहीं, राज्यसभा में उत्पादकता का स्तर 39 प्रतिशत दर्ज किया गया। राज्यसभा में भी विपक्षी दलों ने कई मौकों पर जमकर हंगामा किया और कार्यवाही के दौरान सदन से बाहर चले गए। उन्होंने बताया कि लोकसभा में केवल एक ही महत्वपूर्ण कानून पर अच्छी बहस हो सकी, जो परीक्षाओं में नकल रोकने से संबंधित विधेयक था। इसके अलावा किसी भी अन्य मुद्दे या विधेयक पर लोकसभा में कोई ठोस चर्चा नहीं हो पाई, जिससे सरकार और संसद दोनों के समय का नुकसान हुआ।
तीन दशक के करियर में पहली बार देखा ऐसा रवैया
केंद्रीय मंत्री ने विपक्ष के इस अड़ियल रुख पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि संसद में उनका लगभग 30 वर्षों का अनुभव रहा है। अपने इस लंबे संसदीय जीवन में उन्होंने ऐसा नजारा कभी नहीं देखा। उन्होंने कहा,
"आमतौर पर यह देखा जाता है कि विपक्षी पार्टियां सरकार को घेरने के लिए चर्चा की मांग करती हैं और सरकार कई बार चर्चा से बचने का प्रयास करती है। लेकिन इस बार पूरी कहानी उलट गई। यह देश के संसदीय इतिहास में पहली बार हो रहा है जब सरकार खुद सामने से आकर कह रही है कि वह हर मुद्दे पर खुली और विस्तृत चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष चर्चा के मंच से भाग रहा है।"
उन्होंने इस स्थिति को अकल्पनीय बताते हुए कहा कि विपक्ष का यह रवैया लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। चर्चा से भागना और केवल हंगामा करना किसी भी तरह से देश के हित में नहीं हो सकता।
'सुबह उठते हैं और हंगामा शुरू कर देते हैं'
कांग्रेस पर सीधा निशाना साधते हुए किरेन रिजिजू ने बेहद तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी के सांसदों ने यह मान लिया है कि उनका एकमात्र काम संसद में आकर सिर्फ नारे लगाना और तख्तियां दिखाना रह गया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, "कांग्रेस के सांसद सुबह उठते हैं, संसद भवन पहुंचते हैं और सीधे नारेबाजी और हंगामा शुरू कर देते हैं।"
इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस पार्टी के नए और युवा सांसदों के प्रति अपनी सहानुभूति भी जताई। उन्होंने कहा कि वह कांग्रेस के नए सांसदों की मनःस्थिति और उनके दर्द को अच्छी तरह समझ सकते हैं। रिजिजू ने कहा कि अगर संसद के भीतर किसी विषय पर स्वस्थ बहस और चर्चा ही नहीं होगी, तो ये नए सांसद संसदीय प्रक्रियाओं को सीखेंगे कैसे? एक जनप्रतिनिधि के रूप में उनका विकास कैसे होगा? केंद्रीय मंत्री ने उम्मीद जताई कि आगामी शीतकालीन सत्र में विपक्षी दल सकारात्मक रुख अपनाएंगे और जब संसद का अगला सत्र शुरू होगा, तो देश को एक बेहतर और चर्चा से भरपूर माहौल देखने को मिलेगा।
गृह मंत्री अमित शाह को लिखना पड़ा पत्र
इस गतिरोध को दूर करने के लिए सरकार की ओर से किए गए प्रयासों का उल्लेख करते हुए किरेन रिजिजू ने एक बड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि विपक्ष को चर्चा के मेज पर लाने के लिए सरकार इस हद तक गंभीर थी कि गृह मंत्री अमित शाह को खुद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक विशेष पत्र लिखना पड़ा। इस पत्र में गृह मंत्री ने स्पष्ट किया था कि सरकार संसद में हर विषय पर खुली, व्यापक और विस्तृत चर्चा कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से यह अनुरोध भी किया था कि वे विपक्षी नेताओं से बात करें और उन्हें संसद की कार्यवाही और चर्चा में शामिल होने के लिए मनाएं।
रिजिजू ने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या देश के इतिहास में कभी ऐसा सुना गया है कि सरकार को खुद लोकसभा अध्यक्ष से यह गुहार लगानी पड़े कि वे विपक्ष को चर्चा के लिए राजी करें? उन्होंने कहा कि सरकार ने अंतिम दिन भी विपक्ष से बार-बार सदन में चर्चा शुरू करने की अपील की, लेकिन विपक्ष के पास सरकार के तर्कों का सामना करने की 'हिम्मत' नहीं थी। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि विपक्ष का यह नकारात्मक रवैया भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए बिल्कुल भी अच्छा संकेत नहीं है।
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