विदेश में डॉक्टरी का सपना देख रहे भारतीय छात्रों की राह में रोड़ा, USMLE और PLAB परीक्षा देने में आ रही बड़ी दिक्कत करियर 2 घंटे पहले 3
भारत के हजारों मेडिकल छात्र जो विदेश में प्रैक्टिस करने का लक्ष्य रखते हैं, वे इस समय एक तकनीकी संकट के कारण अपनी लाइसेंसिंग परीक्षाएं नहीं दे पा रहे हैं। वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेडिकल एजुकेशन की मान्यता में देरी के चलते छात्रों के करियर पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।

विदेश में करियर का सपना और वर्तमान संकट

भारत में मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद बड़ी संख्या में युवा डॉक्टर्स अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य विकसित देशों में अपना करियर बनाने का सपना देखते हैं। इन देशों में प्रैक्टिस शुरू करने के लिए छात्रों को वहां की स्थानीय लाइसेंसिंग परीक्षाएं, जैसे अमेरिका के लिए USMLE और ब्रिटेन के लिए PLAB, पास करनी पड़ती हैं। हालांकि, हाल ही में बदले हुए अंतरराष्ट्रीय नियमों के कारण भारतीय मेडिकल स्नातकों के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। वर्तमान में, भारतीय छात्र इन परीक्षाओं के लिए पंजीकरण करने में असमर्थ हैं, जिससे हजारों छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है।

मान्यता प्रक्रिया में कहां आ रही है बाधा?

इस पूरे मामले की जड़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू किए गए नए नियम हैं। अब केवल उन्हीं देशों के मेडिकल ग्रेजुएट्स इन परीक्षाओं में बैठने के पात्र हैं, जिनके मेडिकल कॉलेजों या नियामक संस्थाओं को WFME यानी वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेडिकल एजुकेशन से आधिकारिक मान्यता प्राप्त हो। भारत में मेडिकल शिक्षा को विनियमित करने वाली संस्था नेशनल मेडिकल कमीशन यानी NMC इस मान्यता प्रक्रिया को पूरा करने के काम में जुटी हुई है। दुखद यह है कि विभिन्न तकनीकी कारणों, कागजी कार्यवाही और प्रशासनिक देरी के कारण यह प्रक्रिया निर्धारित समय पर संपन्न नहीं हो सकी है। जब तक NMC को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह जरूरी मान्यता नहीं मिल जाती, तब तक विदेशी परीक्षा एजेंसियां भारतीय एमबीबीएस डिग्री धारकों के आवेदनों को स्वीकार नहीं कर रही हैं।

छात्रों पर पड़ रहा करियर और आर्थिक असर

इस प्रशासनिक देरी का सीधा खामियाजा उन छात्रों को भुगतना पड़ रहा है जिन्होंने अपनी मेहनत और लाखों रुपये की पूंजी अपने सपनों को पूरा करने के लिए लगा दी थी। इसके प्रभाव को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है:

  • समय की बर्बादी: विदेश में जाकर काम करने का सपना संजोने वाले छात्रों ने कई वर्ष पहले से इसकी तैयारी शुरू की थी। परीक्षाओं में न बैठ पाने के कारण उनके करियर का कीमती समय बर्बाद हो रहा है।
  • वित्तीय संकट: कोचिंग की भारी फीस, विदेशी परीक्षाओं की महंगी एप्लीकेशन फीस और तैयारी में निवेश की गई रकम अब जोखिम में है। कई छात्रों ने इसके लिए बड़े कर्ज लिए थे, जिनका ब्याज उनके तनाव को और बढ़ा रहा है।
  • मानसिक दबाव: भविष्य को लेकर छाई अनिश्चितता के चलते युवा डॉक्टरों का मनोबल टूट रहा है। एक तरफ करियर आगे नहीं बढ़ पा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उनके निवेश का कोई स्पष्ट परिणाम नहीं दिख रहा है।

समाधान की दिशा में क्या कदम जरूरी हैं?

मेडिकल विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यह समस्या निजी स्तर पर हल नहीं की जा सकती। इसके समाधान के लिए सरकार और NMC को युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है। छात्रों की मांग है कि सरकारी स्तर पर हस्तक्षेप करके WFME के साथ समन्वय बिठाया जाए और मान्यता की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा किया जाए। जब तक भारत की नियामक व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हरी झंडी नहीं मिल जाती, तब तक विदेशी विश्वविद्यालयों और अस्पतालों के दरवाजे भारतीय डॉक्टरों के लिए बंद रहेंगे। आने वाले समय में संबंधित निकायों को प्राथमिकता के आधार पर इस तकनीकी अड़चन को दूर करना होगा ताकि देश के होनहार डॉक्टरों का करियर बर्बाद होने से बचाया जा सके।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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