एनसीईआरटी की 9वीं की राजनीति विज्ञान किताब में बदलाव, 1975 की इमरजेंसी शामिल और प्रस्तावना में कटौती करियर 2 महीने पहले 77
एनसीईआरटी ने कक्षा 9वीं की राजनीति विज्ञान की पुस्तक 'लोकतांत्रिक राजनीति-1' में बड़े बदलाव किए हैं, जिसमें 1975 के आपातकाल को नए अध्याय के रूप में जोड़ा गया है। साथ ही, किताब के कुछ हिस्सों से संविधान की प्रस्तावना और धर्मनिरपेक्षता से जुड़े संदर्भों को हटाए जाने की चर्चा है।

कक्षा 9 की किताब में बड़े बदलाव

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी ने अपने पाठ्यक्रम में एक बार फिर बड़ा बदलाव किया है। इस बार कक्षा 9वीं की राजनीति विज्ञान की किताब 'लोकतांत्रिक राजनीति-1' को अपडेट किया गया है। नए शैक्षणिक सत्र के लिए तैयार की गई इस किताब में देश के इतिहास के एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण अध्याय यानी वर्ष 1975 के 'आपातकाल' को शामिल किया गया है। अब स्कूली बच्चे भारतीय लोकतंत्र के उस दौर के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे, जिसे लेकर देश की राजनीति में हमेशा चर्चा रहती है।

इमरजेंसी के अध्याय की एंट्री

किताब के 'लोकतांत्रिक अधिकार' नामक चैप्टर में 'आपातकाल के दौरान अधिकारों का निलंबन' शीर्षक से एक नया सेक्शन जोड़ा गया है। इस पाठ में बताया गया है कि 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर राष्ट्रपति ने देश में आपातकाल लागू करने का निर्णय लिया था। इसमें उन परिस्थितियों का जिक्र है जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था, प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लागू की गई थी और बड़े पैमाने पर विपक्षी नेताओं को सलाखों के पीछे भेज दिया गया था। एनसीईआरटी का मानना है कि छात्रों को भारतीय लोकतंत्र की इन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों की जानकारी होना आवश्यक है ताकि वे व्यवस्था के महत्व को समझ सकें।

प्रस्तावना और सेकुलरिज्म पर बहस

एक तरफ जहां इमरजेंसी को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है, वहीं दूसरी तरफ कुछ बदलावों ने विवाद को जन्म दे दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा 9वीं की इस किताब से संविधान की प्रस्तावना यानी Preamble को पहले की तरह प्रमुखता से नहीं छापा गया है। पूर्व की किताबों में प्रस्तावना को शुरुआती पन्नों में ही स्थान दिया जाता था, जिसमें 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' जैसे शब्द विशेष रूप से शामिल होते थे। अब इन रेफरेंस को हटा दिया गया है या बहुत सीमित कर दिया गया है। इसके साथ ही, किताब में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा और उससे जुड़े महत्व को बताने वाले पैराग्राफ में भी काफी काट-छांट की गई है, जिस पर शिक्षा जगत के विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग राय देखने को मिल रही है।

एनसीईआरटी का क्या है तर्क

पाठ्यक्रम में किए गए इन बदलावों को लेकर एनसीईआरटी के अधिकारियों का आधिकारिक तर्क स्पष्ट है। उनका कहना है कि यह कदम एनईपी 2020 यानी नई शिक्षा नीति की सिफारिशों के अनुरूप उठाया गया है। परिषद का मानना है कि स्कूली किताबों से छात्रों का बोझ कम करना और उन्हें आधुनिक संदर्भों के हिसाब से तैयार करना उनकी प्राथमिकता है। अधिकारियों के मुताबिक, पाठ्यक्रम से उन हिस्सों को हटाया या संक्षेपित किया गया है जो दोहराव पैदा कर रहे थे। उनका उद्देश्य छात्रों को केवल वही जानकारी देना है जो उनके लिए अत्यंत आवश्यक है, जिससे वे ऐतिहासिक घटनाओं और लोकतंत्र की बारीकियों को अधिक गहराई से समझ सकें।

जानकारों की मिली-जुली प्रतिक्रिया

शिक्षाविदों और शिक्षकों का एक वर्ग इस बदलाव को लेकर चिंतित है। उनका कहना है कि इमरजेंसी जैसे अध्याय को शामिल करना छात्रों के लिए इतिहास को बेहतर ढंग से समझने का एक अच्छा अवसर है, बशर्ते उन्हें पूरी निष्पक्षता के साथ पढ़ाया जाए। हालांकि, संविधान की मूल आत्मा से जुड़े शब्दों जैसे प्रस्तावना और सेकुलरिज्म के संदर्भों को हटाना कई लोगों को खटक रहा है। शिक्षकों का मानना है कि क्लासरूम में चर्चा का दायरा इन बदलावों के बाद प्रभावित हो सकता है। फिलहाल इन बदलावों को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ी हुई है, जो आने वाले समय में और भी तेज हो सकती है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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