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11 घंटे पहले
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सफेद कोट पहनना, गले में स्टेथोस्कोप लटकाना और मरीजों की जान बचाना, यह भारत के लाखों युवाओं का सपना होता है। हर साल लाखों छात्र इसी उम्मीद में दिन-रात मेहनत करते हैं कि वे एक दिन डॉक्टर बन सकें। हालांकि, इस सपने को पूरा करने की राह काफी कठिन है। NEET की परीक्षा पास करने के बाद जब छात्र मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेते हैं, तो वहां से उनकी असली और कड़ी ट्रेनिंग की शुरुआत होती है।
मेडिकल की पढ़ाई को लेकर अक्सर लोगों के मन में यह उत्सुकता रहती है कि आखिर MBBS की पढ़ाई कितने समय की होती है और इस दौरान छात्रों को क्या-क्या पढ़ना पड़ता है। भारत में MBBS का कुल कोर्स 5.5 साल का होता है। इस पूरे सफर को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा गया है, जिसमें 4.5 साल की किताबी और क्लिनिकल पढ़ाई शामिल है, जबकि आखिरी का 1 साल अनिवार्य रोटेटिंग इंटर्नशिप के लिए तय किया गया है। इन साढ़े पांच वर्षों में मेडिकल के छात्रों को मानव शरीर की हर बारीक जानकारी देकर इलाज का विशेषज्ञ बनाया जाता है। आइए जानते हैं कि इस कोर्स के दौरान साल-दर-साल छात्रों को क्या-क्या सिखाया जाता है।
चिकित्सा विज्ञान की नींव: प्रथम वर्ष (14-15 महीने)
MBBS के पहले साल में छात्रों को मानव शरीर की बुनियादी संरचना और उसके अंगों की सामान्य कार्यप्रणाली के बारे में विस्तार से सिखाया जाता है। यह कोर्स का शुरुआती आधार होता है, जिसमें मुख्य रूप से तीन विषयों की गहन पढ़ाई कराई जाती है:
- एनाटॉमी (Anatomy): इसके तहत मेडिकल छात्रों को कैडावर यानी मृत शरीर के माध्यम से हड्डियों, मांसपेशियों, नसों और शरीर के विभिन्न अंगों की बनावट को बहुत गहराई से समझाया जाता है।
- फिजियोलॉजी (Physiology): इस विषय में छात्र यह सीखते हैं कि जीवित मानव शरीर के अलग-अलग अंग और प्रणालियां सामान्य रूप से किस तरह से काम करती हैं।
- बायोकेमिस्ट्री (Biochemistry): इसके अंतर्गत शरीर के भीतर होने वाली विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं और ब्लड टेस्ट यानी रक्त जांच से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं को पढ़ाया जाता है।
बीमारियों और दवाओं की समझ: द्वितीय वर्ष (1 वर्ष)
जब छात्र मानव शरीर की सामान्य बनावट और कार्यप्रणाली को समझ लेते हैं, तो दूसरे साल में उन्हें बीमारियों के कारणों, उनके लक्षणों और दवाओं के असर के बारे में पढ़ाया जाता है। इस वर्ष के मुख्य विषय इस प्रकार हैं:
- पैथोलॉजी (Pathology): इसमें इस बात का अध्ययन किया जाता है कि शरीर में बीमारियां क्यों और कैसे पनपती हैं और उनका पूरे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है।
- फार्माकोलॉजी (Pharmacology): इस विषय में दवाओं के बारे में विस्तार से सिखाया जाता है कि कौन सी दवा किस बीमारी में किस तरह असर करती है और उनके क्या-क्या साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं।
- माइक्रोबायोलॉजी (Microbiology): इसके तहत विभिन्न प्रकार के बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और इनसे होने वाले संक्रमणों के बारे में विस्तार से पढ़ाया जाता है।
- फॉरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी (FMT): इसमें मेडिकल छात्रों को पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया और कानून से जुड़े मेडिकल मामलों यानी मेडिकल-लीगल केस की महत्वपूर्ण जानकारी दी जाती है।
सामुदायिक स्वास्थ्य और विशिष्ट अंग: तृतीय वर्ष - भाग-1 (1 वर्ष)
तीसरे साल के पहले भाग में छात्रों को सामान्य रूप से होने वाली बीमारियों के साथ-साथ शरीर के कुछ खास अंगों और देश की स्वास्थ्य प्रणालियों के बारे में प्रशिक्षित किया जाता है:
- कम्युनिटी मेडिसिन (PSM): इसके तहत देश की सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं, महामारियों के प्रबंधन और ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य समस्याओं और उनके समाधान के बारे में पढ़ाया जाता है।
- ईएनटी (ENT): इस विषय में कान, नाक और गले से जुड़ी बीमारियों और उनके इलाज की बारीकियों को सिखाया जाता है।
- ऑफ्थैल्मोलॉजी (Ophthalmology): इसमें आंखों की विभिन्न बीमारियों, उनकी जांच की विधियों और इलाज के तरीकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाती है।
सच्ची डॉक्टरी और सर्जरी की मास्टर क्लास: फाइनल ईयर (12-18 महीने)
यह MBBS की पढ़ाई का सबसे महत्वपूर्ण, लंबा और चुनौतीपूर्ण हिस्सा होता है, जहां छात्रों को सीधे तौर पर मरीजों का इलाज करने के व्यावहारिक गुर सिखाए जाते हैं। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित विषय शामिल होते हैं:
- जनरल मेडिसिन: इसके तहत गंभीर और जटिल बीमारियों का बिना किसी ऑपरेशन के, सिर्फ दवाओं के जरिए इलाज करने की विशेषज्ञता दी जाती है।
- जनरल सर्जरी: इसमें छात्रों को ऑपरेशन थिएटर के भीतर की जाने वाली सर्जरी और टांके लगाने की बुनियादी से लेकर एडवांस तकनीकों को सिखाया जाता है।
- गायनेकोलॉजी (OB-GYN): इस विषय के अंतर्गत महिला स्वास्थ्य, प्रसव यानी डिलीवरी और गर्भावस्था के दौरान रखी जाने वाली सावधानियों की ट्रेनिंग दी जाती है।
- पीडियाट्रिक्स: इसमें नवजात शिशुओं और बच्चों को होने वाली बीमारियों और उनके विशेष इलाज के तरीकों के बारे में विस्तार से पढ़ाया जाता है।
लाइसेंस दिलाने वाली 1 साल की अनिवार्य रोटेटिंग इंटर्नशिप
साढ़े चार साल की कठिन थ्योरी और प्रैक्टिकल परीक्षाओं को सफलतापूर्वक पास करने के बाद मेडिकल छात्रों को डॉक्टर की उपाधि तो मिल जाती है, लेकिन वास्तविक रूप से मरीजों का इलाज करने का सरकारी लाइसेंस उन्हें 1 साल की अनिवार्य रोटेटिंग इंटर्नशिप पूरी करने के बाद ही मिलता है। इस 1 साल की अवधि के दौरान छात्रों को अस्पताल के अलग-अलग विभागों जैसे इमरजेंसी वॉर्ड, ICU, लेबर रूम और सर्जरी डिपार्टमेंट में जाकर वास्तविक मरीजों का इलाज करना होता है। यह पूरी इंटर्नशिप अस्पताल के वरिष्ठ और अनुभवी डॉक्टरों की सीधी निगरानी में पूरी की जाती है, ताकि युवा डॉक्टर पेशेवर रूप से पूरी तरह तैयार हो सकें।
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