डॉक्टर और इंजीनियर बनने के लिए अंग्रेजी अब मजबूरी नहीं, हिंदी में शुरू हुई मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करियर एक घंटा पहले 3
देश में तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है, जहाँ अब हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में एमबीबीएस और बीटेक की पढ़ाई की जा रही है। इस पहल से ग्रामीण और छोटे शहरों के उन होनहार छात्रों को नई उम्मीद मिली है जो अंग्रेजी की बाधा के कारण तकनीकी विषयों से दूर रहते थे।

तकनीकी शिक्षा में भाषाई क्रांति

एक समय था जब मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों को केवल अंग्रेजी भाषा की जागीर माना जाता था। स्कूल स्तर तक तो शिक्षा मातृभाषा में हो जाती थी, लेकिन जैसे ही छात्र उच्च शिक्षा के लिए मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज की दहलीज पार करते, अंग्रेजी की तकनीकी शब्दावली उनके लिए सबसे बड़ी बाधा बन जाती थी। विशेषकर ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों से आने वाले मेधावी छात्र, जिनमें प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी, वे केवल अंग्रेजी के माहौल में सामंजस्य न बिठा पाने के कारण पिछड़ जाते थे। अब स्थिति बदल चुकी है, क्योंकि देश के कई प्रमुख संस्थानों में एमबीबीएस और बीटेक जैसे जटिल कोर्स अब हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में पढ़ाए जाने लगे हैं।

भाषाई दीवार को तोड़ने की पहल

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान का प्रसार करना है, न कि उसे किसी विशेष भाषा के पिंजरे में कैद करना। जब छात्र अपनी मातृभाषा में तकनीकी विषयों को समझते हैं, तो उनके आत्म-विश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि होती है। मध्य प्रदेश से शुरू हुई यह पहल अब उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों तक तेजी से फैल चुकी है। इस बदलाव का मूल ध्येय यह है कि ज्ञान की भाषा किसी भी छात्र की सफलता और उसकी प्रतिभा के आंकलन का आधार नहीं बननी चाहिए। अब हिंदी पट्टी के छात्र भी बिना किसी भाषाई संकोच के डॉक्टर और इंजीनियर बनने के अपने सपनों को पंख दे रहे हैं।

मातृभाषा में शिक्षा के फायदे

तकनीकी शिक्षा को हिंदी में लाने का अर्थ केवल भाषा बदलना नहीं, बल्कि छात्रों की सीखने की क्षमता को बेहतर बनाना है। पहले, मेडिकल और इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को अंग्रेजी की मोटी-मोटी किताबें रटने पर मजबूर होना पड़ता था, जिससे विषयों की वास्तविक समझ गौण हो जाती थी। अब स्थिति भिन्न है:

  • बेहतर समझ: छात्र अब एनाटॉमी, फिजिक्स और इंजीनियरिंग के कठिन सिद्धांतों को अपनी सहज भाषा में समझ रहे हैं।
  • रटने की मजबूरी खत्म: जटिल कॉन्सेप्ट्स को रटने के बजाय व्यावहारिक रूप से समझने पर जोर दिया जा रहा है।
  • आत्म-विश्वास: मातृभाषा में पढ़ाई से छात्रों में जटिल विषयों को हल करने का साहस बढ़ा है।
  • ड्रॉपआउट में कमी: भाषा की बाधा दूर होने से उच्च शिक्षा छोड़ने वाले छात्रों की दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।

संस्थानों का योगदान और कार्यान्वयन

इस बड़े शैक्षणिक बदलाव को धरातल पर उतारने में एआईसीटीई (AICTE) और नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इन दोनों सरकारी संस्थानों ने मिलकर एक बड़ी जिम्मेदारी निभाई है और मेडिकल तथा इंजीनियरिंग के पहले व दूसरे वर्ष के पाठ्यक्रमों की मानक किताबों का हिंदी भाषा में अनुवाद और संपादन करवाया है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई इंजीनियरिंग कॉलेज और प्रमुख एनआईटी (NITs) में छात्रों को यह विकल्प दिया जा रहा है कि वे अपनी सुविधा के अनुसार अंग्रेजी या हिंदी माध्यम का चयन कर सकें। यह लचीलापन छात्रों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।

ग्लोबल जरूरतों के साथ संतुलन

यह समझना भी आवश्यक है कि हिंदी में शिक्षा का अर्थ अंग्रेजी का पूर्ण बहिष्कार नहीं है। आज के दौर में रिसर्च और वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं को देखते हुए अंग्रेजी की बुनियादी जानकारी होना भी अनिवार्य है। इसीलिए, ज्यादातर तकनीकी संस्थानों में हिंदी और अंग्रेजी का एक व्यावहारिक तालमेल बिठाया गया है। छात्र अपने कॉन्सेप्ट्स को हिंदी के माध्यम से आसानी से समझ रहे हैं और साथ ही साथ वे अंग्रेजी की तकनीकी शब्दावली से भी परिचित हो रहे हैं। यह संतुलन उन्हें भविष्य में पेशेवर दुनिया की चुनौतियों के लिए तैयार कर रहा है। तकनीकी शिक्षा में आया यह भाषाई लचीलापन आने वाले समय में देश के हर कोने से नई प्रतिभाओं को आगे आने के लिए प्रेरित करेगा।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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