राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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नई दिल्ली में गूंजी भारत की कूटनीति
नई दिल्ली के भारत मंडपम में दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का समापन हो गया है। यह आयोजन केवल एक औपचारिक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती कूटनीतिक धाक का प्रमाण बनकर उभरा है। देर रात चार बजे तक चली गहन बातचीत और तनावपूर्ण वैश्विक स्थितियों के बीच भारत ने न केवल सर्वसम्मति बनाई, बल्कि एक साझा 'नई दिल्ली घोषणापत्र' जारी करने में भी सफलता हासिल की। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच गहराता तनाव, पश्चिम एशिया का अस्थिर माहौल और भारत-चीन के बीच के पुराने मतभेद, इन सभी चुनौतियों के बीच भारत ने जिस तरह से संतुलित रुख अपनाते हुए सर्वसम्मति तैयार की, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है।
ब्रिक्स का नया अध्याय और भारत की भूमिका
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि ब्रिक्स अब केवल देशों का एक समूह नहीं, बल्कि समाधानों का एक इकोसिस्टम बन चुका है। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स अपने तीसरे दशक में प्रवेश कर रहा है और अब दुनिया केवल विचारों या प्रतिबद्धताओं की उम्मीद नहीं करती, बल्कि ठोस परिणामों की अपेक्षा रखती है। प्रधानमंत्री ने चीन को ब्रिक्स की अगली मेजबानी के लिए शुभकामनाएं देते हुए इस सफल आयोजन में योगदान देने वाली सभी टीमों की सराहना की। न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन को आने वाले भविष्य के लिए एक स्पष्ट दिशा माना जा रहा है।
वैश्विक मीडिया और विशेषज्ञों की राय
इस सम्मेलन की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी। जापान टाइम्स ने लिखा कि ईरान युद्ध के बिगड़ते हालातों के बावजूद मोदी ने ब्रिक्स में अद्भुत सामंजस्य बिठाया। ब्लूमबर्ग ने इस स्थिति को 'मोदी का प्रतिद्वंद्वी देशों को एक पन्ने पर लाने का करिश्मा' करार दिया। वहीं, न्यूयॉर्क टाइम्स ने प्रधानमंत्री मोदी को विकासशील दुनिया की सबसे प्रभावशाली आवाज बताया। वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, भारत और चीन के बीच संबंधों में आई नरमी यह संकेत देती है कि भारत खुद को वैश्विक व्यवस्था में नए सिरे से ढालने के लिए प्रतिबद्ध है। रूस के सरकारी समाचार पत्र TASS ने मोदी की कूटनीतिक जीत की सराहना करते हुए कहा कि उनके एजेंडे ने ब्रिक्स को अगले 20 वर्षों के लिए नई दृष्टि दी है। अल जजीरा और इंडोनेशिया के टेम्पो डॉट को जैसे प्रकाशनों ने भी भारत की मध्यस्थता की प्रशंसा की।
भारत के लिए तीन प्रमुख हासिल
नई दिल्ली घोषणापत्र में 45 पन्नों का विस्तृत दस्तावेज और 140 बिंदु शामिल हैं। भारत के लिए इस सम्मेलन से तीन बड़ी सफलताएं निकलकर सामने आई हैं:
- पहलगाम का उल्लेख: 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इस बार ब्रिक्स के साझा घोषणापत्र में क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद, आतंकियों की फंडिंग और सुरक्षित पनाहगाहों के खिलाफ कड़े शब्दों में निंदा की गई। चीन के हस्ताक्षर के साथ इस भाषा का आना भारत की बहुत बड़ी राजनीतिक जीत है।
- सुरक्षा परिषद में दावेदारी: रूस और चीन ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील की प्रमुख भूमिका का समर्थन किया है। यह अब केवल भारत की मांग नहीं, बल्कि ब्रिक्स का सामूहिक वचन बन चुका है।
- एजेंडा निर्धारण: मेजबान होने के नाते भारत ने केवल स्वागत नहीं किया, बल्कि ब्लॉक की दिशा तय की। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि अब ब्रिक्स को परिपक्वता के साथ अगले दो दशकों का महत्वाकांक्षी लक्ष्य लेकर चलना होगा।
ईरान और खाड़ी देशों के बीच पुल
पश्चिम एशिया के युद्ध के कारण इस बार का सम्मेलन बेहद चुनौतीपूर्ण था। प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत ही संवेदनशीलता और चतुराई के साथ ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेशिकायन से मुलाकात की और उन्हें विश्वास में लिया। भारत ने ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच समन्वय बिठाकर एक ऐसा माहौल बनाया जहां दोनों ही पक्ष बातचीत की मेज पर बने रहे। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पेज़ेशिकायन के बीच की केमिस्ट्री अंतरराष्ट्रीय मीडिया के आकर्षण का केंद्र रही। भारत ने यह संदेश दिया कि वह किसी एक खेमे में फंसने के बजाय हर समस्या का समाधान खोजने वाला मंच है।
चीन और रूस के साथ कूटनीतिक तालमेल
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत भी चर्चा का विषय रही। दोनों नेताओं के बीच 40 मिनट की महत्वपूर्ण चर्चा हुई, जिसमें आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और हितों पर जोर दिया गया। सीमा पर शांति को द्विपक्षीय संबंधों की बुनियाद माना गया। वहीं, रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ भी प्रधानमंत्री मोदी की केमिस्ट्री पुरानी मजबूती को दोहराती दिखी। घोषणापत्र में किसी विशेष युद्ध का उल्लेख किए बिना एकतरफा प्रतिबंधों की निंदा करना, रूस के लिए राहत भरा कदम रहा। ग्रुप फोटो में मोदी, जिनपिंग और पुतिन का एक साथ होना महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक योजना का हिस्सा था।
विपक्ष के दावों की सच्चाई
यह शिखर सम्मेलन इस दृष्टिकोण से भी ऐतिहासिक रहा कि इसने विपक्ष के पुराने आरोपों को खारिज कर दिया। यह आरोप लगाया जाता रहा था कि भारत सरकार विपक्षी नेताओं को विदेशी मेहमानों से मिलने नहीं देती। हालांकि, इस बार मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से नाश्ते पर मुलाकात की। कांग्रेस ने खुद इन तस्वीरों को साझा किया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत की कूटनीति के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं और यह सम्मेलन राजनीतिक दायरे से ऊपर उठकर राष्ट्रीय गौरव का विषय बना है।
निष्कर्ष
ब्रिक्स 2026 की सफलता केवल कागजों तक सीमित नहीं है। भारत को इसमें पहलगाम मुद्दे पर वैश्विक समर्थन, सुरक्षा परिषद में स्थायी मजबूती और 26 पीड़ित परिवारों का धन्यवाद मिला है। दुनिया के बंटे हुए हालातों में नई दिल्ली से निकला फैसला यह बताता है कि भारत अब वैश्विक राजनीति का केंद्र बिंदु बन चुका है। भारत की भाषा, भारत की मेज़बानी और भारत की इच्छाशक्ति ने ही ब्रिक्स की इस सफलता को संभव बनाया है।
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