करियर
एक घंटा पहले
3
विचारों
अहमदाबाद में शिक्षा की नई अलख
अक्सर गरीबी और घर की मजबूरियां मासूम बच्चों से उनकी किताबें छीन लेती हैं। अहमदाबाद के सरकारी और नगर निगम स्कूलों के शिक्षकों ने एक ऐसा उदाहरण पेश किया है जो समाज के लिए प्रेरणा बन गया है। गुजरात सरकार के विशेष बैक टू स्कूल अभियान के माध्यम से शिक्षकों ने अपनी छुट्टियों की चिंता किए बिना ऐसे बच्चों को खोज निकाला, जिन्होंने पढ़ाई का रास्ता छोड़ दिया था। इन बच्चों में कोई मंडियों में सब्जी बेचकर परिवार की मदद कर रहा था, तो कोई अपने छोटे भाई-बहनों की देखरेख में लगा था। शिक्षकों की अटूट मेहनत के कारण अहमदाबाद में पढ़ाई से दूर हो चुके 86 प्रतिशत बच्चों को वापस शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा गया है।
सफलता के शानदार आंकड़े
गुजरात सरकार ने बीते शैक्षणिक वर्ष में पूरे राज्य के लगभग 44,000 सरकारी और अनुदान प्राप्त स्कूलों का सर्वे किया था। इस जांच में 6.41 लाख ऐसे बच्चों की पहचान हुई, जिन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। राज्य शिक्षा विभाग ने मई और जून 2026 में इन बच्चों को वापस स्कूल लाने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया। अहमदाबाद शहर के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां चिन्हित किए गए 10,387 बच्चों में से 9,036 बच्चों का दोबारा स्कूलों में दाखिला सुनिश्चित किया गया। इसके अलावा, 1,357 ऐसे बच्चे भी मिले जो दूसरे राज्यों में चले गए थे या आईटीआई में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे।
घर-घर जाकर माता-पिता को किया प्रेरित
यह उपलब्धि किसी चमत्कार से कम नहीं है क्योंकि इसे हासिल करने के लिए शिक्षकों को काफी संघर्ष करना पड़ा। वासना नगर निगम स्कूल की प्रधान शिक्षिका नीताबेन भद्रेशा उन शिक्षकों में शामिल हैं, जिन्होंने भीषण गर्मी की परवाह न करते हुए अपने स्कूटर पर सवार होकर शहर के हर कोने की खाक छानी। उन्होंने बच्चों के पते ढूंढे और उनके माता-पिता से मुलाकात की। कई मामलों में अभिभावक बच्चों को काम पर भेजने के लिए अड़े हुए थे, लेकिन शिक्षकों ने उन्हें समझाया कि बच्चा कमाई का जरिया नहीं बल्कि कल का भविष्य है। उन्होंने परिवारों को शिक्षा के महत्व से अवगत कराया और बच्चों को स्कूल भेजने के लिए राजी किया।
चुनौतियां और संघर्ष की कहानियां
शिक्षण कार्य के दौरान शिक्षकों को कई तरह की सामाजिक और व्यावहारिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। असरवा और जहांगीरपुरा जैसे इलाकों में स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण थी। जहांगीरपुरा स्कूल के शिक्षक सुकेतुभाई याग्निक ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके विद्यालय के 37 ड्रॉपआउट छात्रों में से 80 फीसदी से अधिक लड़कियां थीं। उन्होंने बताया कि सामाजिक मान्यताओं और रूढ़ियों के कारण 8वीं कक्षा के बाद अभिभावक लड़कियों को घर के कामकाज और छोटे बच्चों की देखभाल के लिए घर पर बैठा देते थे। इसके अलावा, प्रवासी परिवारों का लगातार अपना पता और मोबाइल नंबर बदलना भी एक बड़ी बाधा बना, लेकिन शिक्षकों ने हार नहीं मानी और हर स्तर पर संपर्क साधने की कोशिश जारी रखी।
मुख्यमंत्री ने सराहा शिक्षकों का योगदान
शिक्षकों की इस मानवीय पहल का असर अब साफ दिखाई दे रहा है। पढ़ाई से दूर हो चुके हजारों बच्चों के हाथ में फिर से कलम और किताब है। इस ऐतिहासिक कार्य की प्रशंसा करते हुए 22 जुलाई को गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने उन सभी शिक्षकों को विशेष रूप से सम्मानित किया, जिन्होंने ड्रॉपआउट बच्चों को वापस लाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। नगर निगम स्कूल बोर्ड के अधिकारियों का मानना है कि शिक्षकों का निरंतर प्रयास और उन्हें सरकारी योजनाओं की सही जानकारी देने का तरीका ही इस सफलता का असली आधार बना। इस अभियान ने न केवल बच्चों को वापस स्कूल पहुंचाया है, बल्कि उनके अंधकारमय भविष्य को नई रोशनी भी दी है।
Comments
0 comment