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2 घंटे पहले
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कुछ शिक्षण संस्थानों की कहानी सिर्फ इमारतों और कक्षाओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह संघर्ष, समर्पण और समाज निर्माण की जीती-जागती मिसाल बन जाती है। अंबाला कैंट का सनातन धर्म (एसडी) कॉलेज भी ऐसा ही एक नाम है, जिसने देश विभाजन की त्रासदी झेली, अपनी समूची विरासत पीछे छोड़ी, मगर शिक्षा की लौ को कभी बुझने नहीं दिया। आज 110 वर्षों का सफर पूरा कर चुका यह कॉलेज अपनी ऐतिहासिक पहचान को संजोए रखने के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में भी नई बुलंदियों को छू रहा है।
लाहौर में पड़ी थी नींव
साल 1916 में अविभाजित भारत के लाहौर में स्थापित इस कॉलेज की बुनियाद भारतीय संस्कृति, राष्ट्र निर्माण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के उद्देश्य के साथ रखी गई थी। मदन मोहन मालवीय के विचारों से प्रेरित इस संस्थान को भाई वीर सिंह, पंडित दीनदयाल और कई समाजसेवियों का सहयोग मिला। पंडित रघुबर दयाल इसके प्रथम प्राचार्य बने और कॉलेज ने जल्द ही शिक्षा जगत में अपनी अलग पहचान कायम कर ली।
विभाजन के बाद अस्तित्व पर मंडराया संकट
साल 1947 में देश विभाजन के साथ कॉलेज के सामने अस्तित्व का गहरा संकट खड़ा हो गया। लाहौर में स्थित भवन, पुस्तकालय और करीब 45 लाख रुपये की संपत्ति वहीं छोड़नी पड़ी। इसके बावजूद शिक्षकों और प्रबंधन ने हिम्मत नहीं हारी और अगस्त 1947 में अंबाला पहुंचकर सनातन धर्म मंदिर में कक्षाएं शुरू कर दीं। सीमित संसाधनों के बीच भी विद्यार्थियों की पढ़ाई नहीं रुकी और लगभग नौ सालों तक मंदिर परिसर ही कॉलेज का अस्थायी कैंपस बना रहा।
संस्थान को स्थायी रूप देने की दिशा में बड़ा कदम साल 1951 में उठा, जब देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कॉलेज भवन की आधारशिला रखी। इसके बाद 1956 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने भवन का उद्घाटन किया। यहीं से कॉलेज ने एक नए दौर में प्रवेश किया और लगातार विकास की राह पर आगे बढ़ता चला गया।
नोबेल विजेता अब्दुस सलाम यहीं के छात्र रहे
एसडी कॉलेज की पहचान उसके गौरवशाली पूर्व छात्रों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले वैज्ञानिक अब्दुस सलाम इसी संस्थान के विद्यार्थी रहे हैं। इसके अलावा कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, शिक्षाविद और प्रशासक यहां से निकले। राजनीतिक क्षेत्र में पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, पूर्व सांसद रत्न लाल कटारिया, हरियाणा के कैबिनेट मंत्री अनिल विज और विधायक निर्मल सिंह जैसे नाम भी इस संस्थान की उपलब्धियों में शुमार हैं।
दिलचस्प बात यह है कि लाहौर में जहां कभी एसडी कॉलेज चलता था, वहां आज राजकीय एमओए कॉलेज संचालित हो रहा है। वहां की मौजूदा प्राचार्य डॉ. आलिया रहमान खान ने एसडी कॉलेज से संपर्क कर 1916 के मूल दस्तावेजों और स्टाफ से जुड़ी ऐतिहासिक जानकारी जुटाने की पहल की है। वहीं कॉलेज के अभिलेखागार में वर्ष 1948-49 का मूल प्रॉस्पेक्टस आज भी सुरक्षित रखा गया है, जो संस्थान की समृद्ध विरासत का सबूत है।
समय के साथ खुद को बदल रहा संस्थान
कॉलेज की प्राचार्य डॉ. अल्का शर्मा ने बताया कि संस्थान वक्त के साथ खुद को निरंतर अपडेट कर रहा है। फिलहाल यहां 15 से अधिक पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बीबीए, बीसीए, बीवोक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी जैसे रोजगारपरक कोर्स विद्यार्थियों को आधुनिक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर इस संस्थान के विद्यार्थी हर साल अलग-अलग प्रतियोगिताओं में मेडल जीत रहे हैं। साथ ही उनके कॉलेज को NAAC की ओर से A++ ग्रेड मिला हुआ है।
दाखिले के लिए उपलब्ध हैं पर्याप्त सीटें
डॉ. अल्का शर्मा के मुताबिक कॉलेज में विभिन्न स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए पर्याप्त सीटें उपलब्ध हैं। इनमें बीए (एडेड) में 320, बीए (सेल्फ फाइनेंस) में 60, बीए मेजर इन इंग्लिश में 50, बीए मेजर इन पॉलिटिकल साइंस में 50 और बीए मेजर इन संस्कृत में 20 सीटें निर्धारित हैं।
इसके अलावा बीबीए में 120, बीकॉम (एडेड) में 90, बीकॉम (सेल्फ फाइनेंस) में 255, बीसीए में 180, बीएससी होम साइंस में 30, बीएससी लाइफ साइंस में 60, बीएससी फिजिकल साइंस (एडेड) में 160, बीएससी फिजिकल साइंस (सेल्फ फाइनेंस) में 55 और बीएससी मेजर इन इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में 40 सीटों पर प्रवेश दिए जाएंगे।
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