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एक घंटा पहले
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शिक्षा और संघर्ष की शुरुआत
बिहार के गया जिले में स्थित बांके बाजार प्रखंड का मोनेया गांव आज एक प्रेरणादायक कहानी के लिए चर्चा में है। यहाँ के रहने वाले महेश्वर प्रसाद सिंह का सफर एक किसान परिवार से शुरू होकर राज्य के पहले BPSC चयनित प्रधानाध्यापक बनने तक का रहा है। महेश्वर प्रसाद सिंह अपने गांव के दूसरे ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने शिक्षक के रूप में पहचान बनाई। उनसे पहले गांव के श्रवण कुमार ने शिक्षक बनकर गांव का मान बढ़ाया था, जिनसे प्रेरित होकर महेश्वर ने भी शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का संकल्प लिया। अपनी मैट्रिक की पढ़ाई उन्होंने गुरिया हाई स्कूल से पूरी की, जिसके बाद उन्होंने आगे की शिक्षा के लिए संघर्ष किया।
शिक्षक बनने का सफर
शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने शेरघाटी टीचर ट्रेनिंग कॉलेज से 2 वर्षों का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद वर्ष 1987 में उनका चयन प्राइमरी शिक्षक के तौर पर हुआ। लगभग 5 साल तक प्राथमिक स्तर पर सेवाएं देने के बाद, उन्होंने हाई स्कूल शिक्षक की पात्रता हासिल की। वर्ष 1992 में वे हाई स्कूल शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए। उस समय शिक्षकों की भर्ती विद्यालय सेवा बोर्ड के माध्यम से की जाती थी, जिसे अब भंग कर दिया गया है। उनकी पहली पोस्टिंग झारखंड के साहेबगंज में हुई थी, जहां उन्होंने करीब 6 वर्षों तक अपनी जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद उनका तबादला औरंगाबाद के महराजगंज में हुआ, और अंततः वे उसी स्कूल में वापस लौट आए जहां से उन्होंने कभी मैट्रिक की पढ़ाई की थी।
BPSC के माध्यम से नई उपलब्धि
गुरिया हाई स्कूल में महेश्वर प्रसाद सिंह ने सहायक शिक्षक के तौर पर करीब 12 से 13 वर्षों तक कार्य किया। इसी बीच, सरकार ने BPSC के माध्यम से हाई स्कूल में प्रधानाध्यापकों की सीधी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की। महेश्वर प्रसाद ने 2013 में इस परीक्षा में भाग लिया और सफलता प्राप्त की। वर्ष 2014 में उनकी नियुक्ति प्रधानाध्यापक के पद पर हुई और वे एक बार फिर अपने पुराने स्कूल, गुरिया हाई स्कूल में ही लौटे। बाद में वर्ष 2017 में उनका स्थानांतरण बांके बाजार स्थित हाई स्कूल में हुआ, जहां उन्होंने 4 वर्षों तक सेवाएं दीं और अंततः 2021 में वे सेवानिवृत्त हुए।
चयन के कड़े मानदंड
महेश्वर प्रसाद सिंह शेरघाटी अनुमंडल क्षेत्र के पहले ऐसे शिक्षक थे जो BPSC के जरिए प्रधानाध्यापक बने। उस समय सरकार ने चयन के लिए तीन महत्वपूर्ण शर्तें रखी थीं: आवेदक के पास एमए की डिग्री होनी चाहिए, शिक्षक के रूप में कम से कम 10 वर्षों का अनुभव होना चाहिए, और एक निश्चित पे स्केल में होना अनिवार्य था। उस समय शेरघाटी अनुमंडल से 5 अन्य अभ्यर्थियों ने भी इस परीक्षा का प्रयास किया था, लेकिन वे लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सके। इस तरह, सभी मानदंडों को पूरा करते हुए महेश्वर प्रसाद सिंह क्षेत्र के पहले BPSC प्रधानाध्यापक बने।
रिटायरमेंट के बाद भी सक्रिय
आज सेवानिवृत्ति के बाद भी महेश्वर प्रसाद सिंह शिक्षा के प्रति समर्पित हैं। वे बांके बाजार में ही एक निजी स्कूल का संचालन कर रहे हैं ताकि बच्चों को शिक्षित किया जा सके। अपने करियर के 16 से 17 साल उन्होंने उसी स्कूल को दिए जहां से उन्होंने शिक्षा ग्रहण की थी, जो उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि है। उनका परिवार भी शिक्षा के महत्व को समझता है। उनके एक बेटे का चयन BPSC 70वीं के माध्यम से आरडीओ के पद पर हुआ है, जबकि दूसरा बेटा भी BPSC की तैयारी में जुटा है। महेश्वर प्रसाद सिंह की यह यात्रा साबित करती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतरता से ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग भी बड़े मुकाम हासिल कर सकते हैं।
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