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एक घंटा पहले
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विचारों
कई महीनों तक एक-एक पैसे की मजबूती को तरसता रहा भारतीय रुपया अब क्या अपनी खोई हुई साख दोबारा हासिल करने की राह पर है? अमेरिकी डॉलर के आगे लगातार कमजोर पड़ने के बाद बाजार में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या अब रुपया डॉलर को मात देने की तैयारी में है, या फिर अमेरिकी मुद्रा का दबाव उसकी गर्दन पर यूं ही बना रहेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में आई जबरदस्त गिरावट और रिजर्व बैंक (RBI) के मास्टरस्ट्रोक के बाद रुपये के सबसे बुरे दिन पीछे छूट चुके हैं, लेकिन डॉलर को पूरी तरह पटखनी देना अब भी आसान नहीं है.
सोमवार रहा रुपये के लिए बेहद शानदार
भारतीय रुपये के लिए सोमवार का दिन शानदार साबित हुआ. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार दूसरे सत्र में मजबूत होकर 94.71 के स्तर पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान तो यह 94.46 तक पहुंच गया था, जो पिछले पांच हफ्तों का सबसे ऊंचा स्तर है.
रुपये की इस ताजा मजबूती के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच हुआ शुरुआती समझौता है, जिसके बाद रणनीतिक रूप से बेहद अहम ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को दोबारा खोलने का रास्ता साफ हो गया है. यह खबर आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 5% से ज्यादा लुढ़ककर करीब 80 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं. चूंकि भारत अपनी जरूरत का करीब 90% तेल आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल का सस्ता होना रुपये के लिए संजीवनी से कम नहीं है. पिछले ही महीने रुपया 97 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक चला गया था, मगर अब इस साल इसकी गिरावट घटकर सिर्फ 5.6% रह गई है.
आरबीआई का ‘रघुराम राजन फॉर्मूला’
रुपये की गर्दन से डॉलर का फंदा ढीला करने में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की नीतियों का बड़ा योगदान है. 5 जून को मौद्रिक नीति में भले ही ब्याज दरों में कोई बदलाव न हुआ हो, लेकिन आरबीआई ने विदेशी डॉलर को देश में खींच लाने के लिए कई बड़े उपायों का ऐलान किया है.
बैंकिंग जानकार इस स्थिति की तुलना साल 2013 के ‘टेपर टेंट्रम’ संकट से कर रहे हैं, जब तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने FCNR (फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट) स्कीम के जरिए देश में 34 अरब डॉलर की भारी रकम जुटाकर रुपये को 10% तक मजबूत कर दिया था. इस बार भी आरबीआई के कदमों, यानी FCNR डिपॉजिट और ECB नियमों में ढील, से भारतीय बाजार में 30 से 50 अरब डॉलर की विदेशी पूंजी आने की उम्मीद है. जून के शुरुआती दिनों में ही 13,200 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश भारत आ चुका है, जिससे देश का बैलेंस ऑफ पेमेंट (BoP) घाटे से उबरकर मुनाफे की ओर बढ़ता दिख रहा है.
क्या सचमुच आ गए अच्छे दिन या बाकी है चुनौती?
बाजार के जानकारों का कहना है कि आने वाले दिनों में रुपया सुधरकर 93.25 के स्तर तक जा सकता है, लेकिन क्या डॉलर का खौफ पूरी तरह मिट गया है? इसका जवाब अभी ‘हां’ में देना जल्दबाजी होगी. असल में, अमेरिका और ईरान का समझौता अभी शुरुआती चरण में है और पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. इसके अलावा, जब तक कच्चा तेल स्थायी रूप से 75-80 डॉलर के नीचे नहीं आता, तब तक रुपये को पूरी राहत नहीं मिलेगी.
एक पेच यह भी है कि मार्च में आरबीआई के पास 104 अरब डॉलर की रिकॉर्ड शॉर्ट डॉलर पोजीशन थी, जिसका इस्तेमाल वह रुपये को बचाने में कर रहा था. अब जैसे ही रुपया मजबूत होगा, आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार को दुरुस्त करने के लिए दोबारा डॉलर खरीदना शुरू कर सकता है, जिससे रुपये की रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है. कुल मिलाकर, रुपये की गर्दन पर कसा डॉलर का फंदा कुछ ढीला जरूर हुआ है, मगर इसे और मजबूत होने के लिए अभी अतिरिक्त विदेशी निवेश और लगातार सस्ते तेल के सहारे की दरकार रहेगी.
आरबीआई के तीन बड़े कदम, आसान भाषा में
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने डॉलर की कमी दूर करने और रुपये को मजबूती देने के लिए जो कदम उठाए हैं, उन्हें इस तरह समझा जा सकता है:
स्टेप 1: FCNR (B) और NRE डिपॉजिट पर ब्याज दरों में छूट
यह क्या है? विदेशों में रहने वाले भारतीय (NRIs) भारत के बैंकों में विदेशी मुद्रा (जैसे डॉलर) में पैसे जमा करते हैं, जिन्हें FCNR (फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट) और NRE अकाउंट कहा जाता है. पहले आरबीआई ने इन पर बैंकों द्वारा दिए जाने वाले ब्याज की एक सीमा तय कर रखी थी.
आरबीआई ने क्या किया? आरबीआई ने बैंकों को छूट दे दी कि वे एनआरआई निवेशकों को आकर्षित करने के लिए अपनी मर्जी से ज्यादा ब्याज दे सकें.
रुपये को कैसे मजबूत करेगा? जब विदेशी भारतीयों को भारत के बैंकों में ज्यादा ब्याज मिलेगा, तो वे विदेशों से अपना डॉलर भारत भेजेंगे. देश में डॉलर की आपूर्ति बढ़ते ही डॉलर कमजोर होगा और रुपया मजबूत होने लगेगा.
स्टेप 2: विदेशी कर्ज (ECB) की सीमा बढ़ाना
यह क्या है? भारत की बड़ी कंपनियां जब विदेशों या विदेशी बैंकों से लोन लेती हैं, तो उसे एक्सटर्नल कमर्शियल बोरोइंग (ECB) कहते हैं. इसकी एक तय सीमा होती है कि कोई कंपनी साल भर में बाहर से कितना कर्ज ला सकती है.
आरबीआई ने क्या किया? आरबीआई ने कंपनियों के लिए बाहर से डॉलर में कर्ज लेने की सीमा दोगुनी कर दी. पहले यह सीमा 750 मिलियन डॉलर थी, जिसे बढ़ाकर 1.5 बिलियन डॉलर कर दिया गया. साथ ही ब्याज की शर्तों को भी कुछ आसान बना दिया गया.
रुपये को कैसे मजबूत करेगा? जब भारतीय कंपनियां विदेशी बाजारों से आसानी से और बड़ी मात्रा में कर्ज जुटा पाएंगी, तो वे वह पैसा डॉलर के रूप में भारत लेकर आएंगी. भारतीय बाजार में डॉलर बढ़ने से रुपये को सीधा सहारा मिलेगा.
स्टेप 3: सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेश के रास्ते खोलना
यह क्या है? विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) भारत के सरकारी और कॉर्पोरेट बॉन्ड में पैसा लगाते हैं. पहले इसके लिए कई कड़े नियम और मैच्योरिटी की पाबंदियां थीं.
आरबीआई ने क्या किया? आरबीआई ने विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय सरकारी बॉन्ड में निवेश के नियम बेहद आसान बना दिए और छोटी अवधि के बॉन्ड में भी निवेश की अनुमति दे दी.
रुपये को कैसे मजबूत करेगा? नियम आसान होने से विदेशी निवेशक भारत के सुरक्षित सरकारी बॉन्ड में ज्यादा डॉलर लगाएंगे. जून के शुरुआती दिनों में ही इसके जरिए 13,200 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश (FAR Inflows) भारत आ चुका है. जितना ज्यादा निवेश आएगा, रुपया उतना ही मजबूत होगा.
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