छत्तीसगढ़
एक घंटा पहले
2
विचारों
खेती के साथ अतिरिक्त आय का जरिया
बारिश के इस मौसम में किसान भाई अपनी आय बढ़ाने के लिए एक नया और कारगर विकल्प चुन सकते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र बालोद की वैज्ञानिक डॉ. दीपशिखा मनु चंद्राकर के अनुसार, मशरूम की खेती उन लोगों के लिए बेहद फायदेमंद है जो सीमित संसाधनों और कम समय में अधिक लाभ कमाना चाहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मशरूम उत्पादन के लिए आपको पूरे दिन खेतों में मेहनत करने की आवश्यकता नहीं होती। आप अपने नियमित कृषि कार्यों के साथ-साथ इस व्यवसाय को आसानी से संभाल सकते हैं। ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए यह स्वरोजगार का एक बेहतरीन माध्यम बनकर उभरा है।
धान के पैरा का बेहतर प्रबंधन
मशरूम की खेती का एक बड़ा सकारात्मक पहलू पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में धान की कटाई के बाद भारी मात्रा में पैरा यानी धान का भूसा शेष बच जाता है। अक्सर जानकारी के अभाव में किसान इसे खेतों में ही जला देते हैं, जिससे न केवल मिट्टी की उर्वरता कम होती है बल्कि प्रदूषण भी फैलता है। डॉ. दीपशिखा का मानना है कि यदि इस बचे हुए पैरा का उपयोग मशरूम उगाने में किया जाए, तो यह कचरा प्रबंधन का एक शानदार उदाहरण बन सकता है। इससे किसानों को आय का अतिरिक्त जरिया मिलता है और पराली जलाने जैसी हानिकारक प्रथाओं पर भी रोक लगती है।
कौन सी किस्में हैं सबसे उपयुक्त
वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि छत्तीसगढ़ की जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए ऑयस्टर मशरूम और पैरा मशरूम का उत्पादन सबसे अधिक लाभप्रद है। ऑयस्टर मशरूम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे साल भर उगाया जा सकता है, जबकि पैरा मशरूम के लिए जुलाई से सितंबर का समय सबसे उत्तम माना गया है। वर्तमान समय इस खेती को शुरू करने के लिए पूरी तरह अनुकूल है।
मशरूम उत्पादन की प्रक्रिया और विधि
मशरूम उगाने के लिए किसी विशेष भारी मशीनरी की जरूरत नहीं होती है। इसकी प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:
- कमरे का चयन: उत्पादन के लिए एक हवादार और मध्यम रोशनी वाला कमरा होना आवश्यक है। पक्की जमीन वाले कमरों में बेहतर परिणाम मिलते हैं। यदि जमीन कच्ची है, तो सतह पर रेत बिछाना लाभदायक होता है।
- पैरा तैयार करना: सबसे पहले एक 200 लीटर की क्षमता वाले ड्रम में 100 लीटर पानी लें। इसमें ढाई से तीन किलो चूना अच्छी तरह मिलाएं। इस घोल में लगभग 10 किलो पैरा कुट्टी को पूरी रात के लिए भिगोकर रख दें।
- बीज का उपयोग: अगली सुबह पैरा कुट्टी को बाहर निकालकर उसका फालतू पानी निकाल दें। थोड़ा सुखाने के बाद इसे पॉलीथिन के बैग में भरें। इसी दौरान मशरूम का बीज, जिसे स्पॉन कहा जाता है, पैरा की परतों के बीच डाला जाता है।
- देखभाल और विकास: तैयार किए गए बैग्स को साफ और संक्रमण रहित कमरे में रस्सियों की मदद से टांग दें। लगभग 15 से 20 दिनों के भीतर बैग के अंदर सफेद रंग का माइसीलियम फैलता दिखाई देगा।
- पानी का छिड़काव: माइसीलियम दिखने के बाद पॉलीथिन में छोटे कट लगाएं और नियमित रूप से पानी का छिड़काव करें। कुछ ही दिनों में मशरूम निकलना शुरू हो जाएंगे।
कम लागत में एक महीने में मुनाफा
मशरूम उत्पादन की सबसे बड़ी खूबी इसकी तीव्र गति है। डॉ. दीपशिखा के मुताबिक, फसल बोने के लगभग एक महीने के भीतर ही किसान को उत्पादन मिलना शुरू हो जाता है। पूरा उत्पादन चक्र डेढ़ से दो महीने के भीतर समाप्त हो जाता है। कम लागत और कृषि अवशेषों के सही इस्तेमाल के कारण मशरूम की खेती आज के समय में एक अत्यंत प्रभावशाली विकल्प है। यह उन लोगों के लिए एक आदर्श व्यवसाय है जो न्यूनतम निवेश के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाना चाहते हैं।
Comments
0 comment