राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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क्या कानून से ठप हो जाएंगे न्यूज़ रूम
देश के मीडिया जगत पर मंडरा रहे डेटा कानून के संकट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के समक्ष यह गंभीर सवाल खड़ा हुआ है कि क्या डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) अधिनियम के प्रावधान पत्रकारिता के कामकाज को पूरी तरह से रोक देंगे। अदालत में सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि यदि डेटा सुरक्षा के ये नए नियम लागू रहते हैं, तो भविष्य में खोजी पत्रकारिता करना और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को उठाना अत्यंत कठिन हो जाएगा।
कानून से जुड़े हैं गंभीर संवैधानिक सवाल
इस मामले की सुनवाई 27 अक्टूबर को हुई, जिसमें शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने को कहा है। अदालत में यह मामला डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) की तरफ से उठाया गया। याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहीं वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने अदालत के सामने स्पष्ट किया कि यदि पत्रकारिता के पेशे को इन डेटा नियमों से उचित छूट नहीं दी जाती है, तो इसका सीधा असर प्रेस की स्वतंत्रता और जनता के सूचना के अधिकार पर पड़ेगा। पीठ में सीजेआई सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। अदालत ने अब इस मामले को अन्य लंबित याचिकाओं के साथ मिलाकर 17 नवंबर को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया है।
खोजी पत्रकारिता पर मंडराता खतरा
याचिका में मुख्य रूप से यह मुद्दा उठाया गया है कि डीपीडीपी अधिनियम के प्रावधानों के चलते समाचार रिपोर्टिंग का आधार ही खत्म हो सकता है। वकील माधवी दीवान ने सवाल किया कि यदि किसी भ्रष्ट व्यक्ति या किसी प्रभावशाली हस्ती के खिलाफ खबर छापने के लिए उन्हीं से सहमति लेनी पड़े, तो निष्पक्ष रिपोर्टिंग का क्या मतलब रह जाएगा। उन्होंने दलील दी कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनहित में काम करना है, लेकिन सहमति की ये शर्तें खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से पंगु बना देंगी। इसके अलावा, समाचारों के स्रोतों की गोपनीयता बनाए रखना भी इस कानून के कारण एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
लाइव टीवी और समय-संवेदनशील खबरों का भविष्य
सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि टेलीविजन पत्रकारिता पर इन प्रावधानों के असर बेहद खतरनाक हो सकते हैं। टेलीविजन पर खबरें अक्सर लाइव प्रसारित होती हैं और समय का बहुत महत्व होता है। यदि हर खबर और हर डेटा के उपयोग के लिए डेटा प्रिंसिपल की सहमति का इंतजार करना पड़ा, तो समाचार कक्षों का काम प्रभावी रूप से ठप हो जाएगा। वकील ने जोर देकर कहा कि डिजिटल दौर में समाचारों की प्रासंगिकता उनकी गति पर टिकी है, और यह नया कानून इस गति को पूरी तरह से बाधित कर सकता है।
परंपरागत मीडिया और नागरिक पत्रकारिता में अंतर
इस याचिका को पारंपरिक मीडिया की तरफ से अब तक की सबसे व्यापक कानूनी चुनौती माना जा रहा है। माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि वे उन स्थापित और परंपरागत मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं जो रेडियो, टेलीविजन और समाचार पत्रों के माध्यम से दशकों से काम कर रहे हैं। उन्होंने नागरिक पत्रकारिता और लीगेसी मीडिया के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा खींची। उन्होंने कहा कि स्थापित मीडिया संस्थान एक जवाबदेही के साथ काम करते हैं, लेकिन यह नया कानून उनके सामान्य कामकाज को मुश्किल बना रहा है। याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि इन विवादास्पद प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई जाए ताकि मीडिया अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके।
आरटीआई अधिनियम में बदलाव पर चिंता
मीडिया संगठनों ने इस याचिका के जरिए सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की धारा 8(1)(जे) में किए गए हालिया संशोधनों को भी निशाने पर लिया है। याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि इन बदलावों की वजह से सरकारी अधिकारियों से जुड़ी जानकारी हासिल करना अब पहले जैसा सरल नहीं रहा है। इसका सीधा असर सार्वजनिक जांच और पारदर्शिता पर पड़ा है। वकील ने दलील दी कि धारा 8(1)(जे) के संशोधनों ने समाचार जुटाने की पूरी प्रक्रिया और अवधारणा को ही बदल दिया है, जिससे सार्वजनिक हित में सवाल पूछने का दायरा सिकुड़ गया है।
केंद्र सरकार के पास जानकारी मांगने के अधिकार पर सवाल
याचिका में डीपीडीपी अधिनियम के उन प्रावधानों पर भी गहरा संदेह जताया गया है, जो केंद्र सरकार को विभिन्न स्तरों पर जानकारी मांगने का अधिकार देते हैं। समाचार संस्थानों का मानना है कि यदि सरकारी तंत्र का सूचना पर नियंत्रण बढ़ता है, तो जनहित से जुड़ी खबरों को रिपोर्ट करने की उनकी क्षमता सीमित हो जाएगी। अंत में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किया गया यह नोटिस इस कानून की संवैधानिक वैधता और पत्रकारिता पर इसके प्रभाव को तय करने में एक मील का पत्थर साबित होगा। अब सभी की निगाहें 17 नवंबर की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार अपना पक्ष रखेगी।
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