उमर अब्दुल्ला की सरकार पर मंडराया संकट या महज सियासी दांव, जानिए पूरी सच्चाई भारत एक महीने पहले 69
जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सनसनीखेज आरोपों और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक को लेकर छिड़ी खींचतान पर कॉफी पर कुरुक्षेत्र में विस्तृत चर्चा की गई है।

उमर अब्दुल्ला के आरोपों पर भाजपा की सख्त कार्रवाई

जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता, जो पेशे से सुप्रीम कोर्ट के वकील भी हैं, उन्होंने उनकी पार्टी के विधायकों को खरीदने की कोशिश की है। इन आरोपों के सामने आने के बाद सियासत गरमा गई है। भाजपा ने इस पूरे मामले को सिरे से खारिज करते हुए उमर अब्दुल्ला को मानहानि का कानूनी नोटिस भेज दिया है। भाजपा ने स्पष्ट किया है कि यदि उमर अब्दुल्ला ने अगले सात दिनों के भीतर अपने आरोपों के लिए लिखित माफी नहीं मांगी, तो पार्टी उन पर ₹100 करोड़ का मानहानि का मुकदमा दर्ज करेगी।

जम्मू कश्मीर विधानसभा का गणित

मौजूदा विधानसभा की स्थिति पर गौर करें तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 42 और कांग्रेस के पास 6 विधायक हैं। यह कुल संख्या 48 होती है, जो बहुमत के लिए जरूरी 46 के आंकड़े से अधिक है। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस पर सवाल खड़े किए हैं कि जब उमर अब्दुल्ला की सरकार बहुमत के साथ सुरक्षित है, तो भाजपा ₹200 करोड़ खर्च करने और 17 अतिरिक्त विधायकों को जुटाने का जोखिम क्यों लेगी? विशेषज्ञों के मुताबिक, इन आरोपों के पीछे छिपी क्रोनोलॉजी कुछ और ही इशारा करती है और इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव सेट करने की कोशिश हो सकती है।

आरोपों के पीछे की छिपी हुई वजहें

विशेषज्ञों का मानना है कि उमर अब्दुल्ला के बयानों के पीछे कई रणनीतिक कारण हो सकते हैं, जिनका विश्लेषण करना जरूरी है:

  • अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचना: यह आरोप ऐसे समय में लगाए गए हैं जब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पाक सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। उमर द्वारा अपनी सरकार को अस्थिर बताने का दावा अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान कश्मीर की ओर खींचने की एक सोची-समझी कोशिश हो सकती है।
  • पूर्ण राज्य का दर्जा: उमर अब्दुल्ला लगातार केंद्र सरकार पर पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का दबाव बना रहे हैं। प्रशासन और पुलिस पर नियंत्रण न होने के कारण वे खुद को एक शक्तिहीन मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।
  • विकास कार्यों से ध्यान हटाना: सूत्रों की मानें तो उमर सरकार के कामकाज की रफ्तार धीमी है और फाइलों के अटके होने की खबरें हैं। अपने ही विधायकों की नाराजगी से ध्यान हटाने के लिए भी यह एक जरिया हो सकता है।
  • सुरक्षा और प्रशासनिक चुनौतियां: केंद्र सरकार पूर्ण राज्य के दर्जे पर विचार तो कर रही है, लेकिन हालिया आतंकी हमलों, जैसे कि पहलगाम की घटना, ने स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह मजबूत किए बिना प्रशासन की बागडोर सौंपना जोखिम भरा माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोटों का गणित

कार्यक्रम के अगले हिस्से में उत्तर प्रदेश की सियासत पर गहन चर्चा हुई, जहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच मुस्लिम वोट बैंक को लेकर वर्चस्व की जंग शुरू हो गई है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि सपा उन मुसलमानों को पसंद नहीं करती जो मुखर होकर अपनी बात रखते हैं। मसूद ने अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और आजम खान का जिक्र करते हुए सपा की नीयत पर सवाल उठाए और दावा किया कि अब अल्पसंख्यक समुदाय राहुल गांधी के नेतृत्व की ओर उम्मीद से देख रहा है।

दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने इन आरोपों को निराधार बताया है। सपा का कहना है कि उनके नेताओं ने हमेशा अल्पसंख्यकों के हक की बात की है और इसी कारण उन्हें भाजपा की ओर से 'मुल्ला मुलायम' जैसे उपनाम दिए गए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्ष के भीतर की यह कलह अंततः भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है, क्योंकि इससे वोटों का ध्रुवीकरण और अधिक गहरा होता दिख रहा है। कश्मीर की संजीदा राजनीतिक स्थितियां हों या यूपी की चुनावी खींचतान, ये दोनों ही घटनाएं आगामी समय में देश की राजनीति में बड़े उलटफेर की आहट दे रही हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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