संसद का विशेष सत्र और महिला आरक्षण बिल, क्या सरकार के पास है जरूरी बहुमत? भारत 2 घंटे पहले 3
देश की राजनीति में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। चर्चा है कि सरकार संसद का तीन दिन का विशेष सत्र बुला सकती है, जबकि विपक्ष छात्र आंदोलन और गृह मंत्री के बयान की मांग पर अडिग है।

संसद के विशेष सत्र की अटकलें

राजनीतिक गलियारों में इन दिनों संसद के तीन दिन के विशेष सत्र को लेकर जबरदस्त चर्चाएं हैं। ऐसा माना जा रहा है कि सरकार 15 अगस्त के बाद यह सत्र आहूत कर सकती है। इस सत्र का मुख्य उद्देश्य महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयकों को सदन के पटल पर रखना हो सकता है। हालांकि, इन बड़े बदलावों को धरातल पर उतारने के लिए सरकार को संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो तिहाई बहुमत की दरकार है। इसी दिशा में सरकार कदम तभी बढ़ाएगी जब उसे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि उसके पास आंकड़े जुटाने के लिए पर्याप्त समर्थन मौजूद है। सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू और राहुल गांधी के बीच लगभग एक घंटे की लंबी बैठक हुई, जिसमें संसद में जारी गतिरोध और विपक्षी दलों के रुख को लेकर गहन विचार-विमर्श किया गया।

क्षेत्रीय दलों की भूमिका और समर्थन का गणित

सरकार की रणनीति स्पष्ट है कि इतने बड़े संवैधानिक बदलावों को केवल अपने दम पर थोपने का आरोप झेलने के बजाय, वह विपक्ष को विश्वास में लेना चाहती है। विशेष रूप से कांग्रेस को साथ लेकर चलने का प्रयास सरकार की प्राथमिकता में दिखता है। चर्चा में यह बात सामने आई है कि डीएमके और कई अन्य क्षेत्रीय दलों का रुख इन विधेयकों को लेकर सकारात्मक बना हुआ है। सरकार सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ संवाद बनाए हुए है ताकि जरूरत पड़ने पर उसे वांछित समर्थन हासिल हो सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दक्षिण भारत के दल और अन्य सहयोगी सरकार का साथ देते हैं, तो परिसीमन जैसे जटिल विधेयक को पारित कराना सरकार के लिए कहीं अधिक सुगम हो जाएगा।

राहुल गांधी और कांग्रेस का विरोध जारी

एक तरफ जहां सरकार विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने पर केंद्रित है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस और राहुल गांधी का रुख अभी भी पुराने मुद्दों पर अटका हुआ है। 20 जुलाई के छात्र आंदोलन के दौरान पैलेट गन के कथित उपयोग और गृह मंत्री अमित शाह से सदन में जवाब मांगने की मांग पर कांग्रेस लगातार दबाव बना रही है। कांग्रेस का मानना है कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है कि सरकार इन गंभीर आरोपों पर जवाब दे। हालांकि, दूसरी ओर के पैनलिस्टों का तर्क है कि सरकार अब इन विवादों से आगे निकलकर बड़े विधायी एजेंडे पर काम करना चाहती है, जबकि विपक्ष इन्हीं मुद्दों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

भाजपा का पलटवार और संबित पात्रा का दावा

भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। भाजपा सांसद संबित पात्रा ने एक प्रेस वार्ता के जरिए राहुल गांधी पर झूठा नैरेटिव चलाने का आरोप लगाया। पात्रा ने स्पष्ट किया कि 20 जुलाई के संसद चलो आंदोलन में कोई भी गोली नहीं चलाई गई थी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कांग्रेस पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी केवल अपनी पसंद के छात्र आंदोलनों को ही समर्थन देती है। पात्रा ने झारखंड में परीक्षा अनियमितताओं से प्रभावित छात्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि राहुल गांधी वहां के युवाओं की मानसिक पीड़ा पर पूरी तरह मौन हैं।

युवाओं के मुद्दे और विपक्ष की रणनीति

भाजपा अब विपक्ष के हर हमले का आक्रामक जवाब देने की नीति अपना रही है, खासकर युवाओं और छात्रों से जुड़ी समस्याओं पर। सरकार चाहती है कि देश की बहस इन विवादों से उठकर महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर केंद्रित हो। हालांकि, कांग्रेस इन मुद्दों को इतनी आसानी से छोड़ने के मूड में नहीं है। पार्टी अपने समर्थकों को यह संदेश देने में जुटी है कि उन्हीं के निरंतर दबाव के कारण सरकार को मजबूरन कुछ कदम उठाने पड़े हैं।

नेतृत्व और लोकप्रियता का सर्वे

कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की छवि को लेकर एक सर्वे का भी जिक्र किया गया। सर्वे के नतीजों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी शक्ति उनकी ओजस्वी भाषण शैली, स्पष्ट नीतियां और मजबूत नेतृत्व क्षमता है। वहीं, राहुल गांधी को लोगों ने सबसे अधिक सेक्युलर और अपने विचारों पर दृढ़ रहने वाला नेता बताया। रोचक बात यह रही कि विकल्प के तौर पर अरविंद केजरीवाल का नाम भी जनता के बीच प्रमुखता से उभरा है। पैनलिस्टों ने इस दौरान विपक्ष के सामने मौजूद नेतृत्व के संकट और राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी संचार कौशल की कमी पर लंबी चर्चा की।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

कुल मिलाकर, मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े विधायी लक्ष्यों को प्राथमिकता दे रही है, जबकि विपक्ष संसद में गृह मंत्री के बयान और छात्र आंदोलनों के बहाने सरकार को घेरने की कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में यह भी चर्चा की गई कि इससे पहले उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा की रणनीति, राम मंदिर जैसे मुद्दे और उनके असर पर भी विस्तार से मंथन हो चुका है। फिलहाल, संसद का आगामी विशेष सत्र और उसके परिणाम ही तय करेंगे कि भारत की राजनीति किस करवट बैठेगी।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप