राष्ट्रीय राजनीति
एक दिन पहले
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सीमा पर सतर्कता क्यों जरूरी है
वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर चीनी सैनिकों की तैनाती में कमी आने की खबरों और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद भारत एवं चीन के बीच बेहतर होते कूटनीतिक रिश्तों के बीच, भारतीय रक्षा विशेषज्ञों ने देश को एक अहम चेतावनी दी है। रक्षा मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट में उत्तरी सीमा पर चीनी सेना यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की मौजूदगी में आई कमी का खुलासा हुआ है। इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए रिटायर्ड मेजर जनरल प्रमोद सहगल ने जोर देकर कहा कि भारत को अपनी सामरिक सतर्कता और सीमा पर चौकसी के मामले में बिल्कुल भी ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए।
कूटनीतिक संकेतों का क्या अर्थ है
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात पर पूरे विश्व की निगाहें टिकी थीं। मेजर जनरल सहगल के अनुसार, हालांकि भारत और चीन के संबंधों में सुधार के संकेतों का स्वागत किया जाना जरूरी है, लेकिन चीन के साथ व्यवहार करते समय भारत को अपनी रक्षा तैयारियों, सैन्य तैनाती और सीमा पर बन रहे बुनियादी ढांचे के विकास में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आने देनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट और हालिया कूटनीतिक घटनाक्रमों को बहुत ही व्यापक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है।
चीन की मजबूरी और भारत का रुख
मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखें तो चीन दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर जैसे कई मोर्चों पर भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में चीन फिलहाल भारत के साथ तनाव को और अधिक नहीं बढ़ाना चाहता है। वहीं दूसरी ओर, भारत ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच वास्तविक और स्थायी सुधार तभी संभव है जब एलएसी पर पूरी तरह से शांति बनी रहे। वर्ष 2020 के बाद से भारत और चीन के संबंधों का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है, इसलिए केवल राजनीतिक बयानों के भरोसे सुरक्षा नीति को नहीं बदला जा सकता।
चीन की सैन्य क्षमता और भारत की चुनौती
रिटायर्ड मेजर जनरल प्रमोद सहगल ने चीन की सैन्य और परिवहन दक्षता का उल्लेख करते हुए बताया कि चीन को सीमावर्ती इलाकों में बेहतरीन सड़क, रेल और संचार नेटवर्क का लाभ मिलता है। चीन अपनी रिजर्व सैन्य टुकड़ियों को बहुत कम समय में सीमा के अग्रिम क्षेत्रों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। इसके विपरीत, भारत को कठिन पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अपनी सैन्य संरचनाओं और हथियारों की आवाजाही में अधिक समय लग सकता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अगर चीन भविष्य में अपने कुछ सैनिकों को पीछे हटाता भी है, तो भी उनके मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण उन्हें वापस मोर्चे पर लाना बहुत आसान है।
सैनिकों की वापसी या महज रणनीति
सहगल का मानना है कि एलएसी पर सैनिकों के पीछे हटने की प्रक्रिया को पूरी तरह से सैन्य तनाव का अंत नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा कि डिसइंगेजमेंट, डी-एस्केलेशन और डी-इंडक्शन तीनों ही अलग-अलग सैन्य प्रक्रियाएं हैं। गलवान घाटी संघर्ष के बाद मिले अनुभवों से भारत को यह सीख लेनी चाहिए कि सीमा पर थोड़ी सी भी सुरक्षा ढील भविष्य में बड़ी चुनौती का रूप ले सकती है। भारत को अपनी फॉरवर्ड पोजीशन, सैन्य तैयारियों और आधुनिक हथियारों के विकास में किसी तरह का समझौता नहीं करना चाहिए।
बातचीत और विश्वास बहाली के प्रयास
रिपोर्ट में राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर हो रही बातचीत से उत्तरी सीमा पर स्थिरता बढ़ने का उल्लेख किया गया है। इस पर मेजर जनरल ने कहा कि सीमा प्रबंधन और कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स के तहत हुई बातचीत एक सकारात्मक कदम है। विभिन्न सेक्टरों में नई हॉटलाइन और नियमित बैठक तंत्र स्थापित करने का एकमात्र उद्देश्य स्थानीय स्तर पर होने वाली छोटी घटनाओं को बड़े सैन्य टकराव में बदलने से रोकना है। कोर कमांडर स्तर की बातचीत भविष्य में गलतफहमियों को कम करने में काफी मददगार साबित हो सकती है, लेकिन इसके बावजूद भारत को चीन की दीर्घकालिक नीतियों के प्रति पूरी तरह सतर्क रहना होगा।
आधुनिकीकरण की ओर भारत के कदम
ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए सहगल ने कहा कि इस अभियान के माध्यम से भारत ने अपनी खुफिया क्षमता, तकनीकी दक्षता और सेना, वायुसेना तथा नौसेना के बीच बेहतरीन तालमेल का प्रदर्शन किया है। उन्होंने माना कि ऐसे अभियानों से जहां भारत की ताकत का पता चलता है, वहीं कुछ कमियों की पहचान भी होती है। भारतीय सशस्त्र बल इन कमियों को दूर करने के लिए लगातार आधुनिकीकरण की दिशा में काम कर रहे हैं। वर्तमान में भारत ड्रोन तकनीक, आधुनिक हथियार प्रणालियों और अन्य फोर्स मल्टीप्लायर्स को अपनी सेना में शामिल करने पर तेजी से ध्यान दे रहा है।
भविष्य की सुरक्षा चुनौतियां
अंत में उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को आने वाले समय की सभी संभावित चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने खास तौर पर इस बात पर जोर दिया कि यदि भविष्य में कभी भी एक साथ कई मोर्चों पर सुरक्षा संबंधी चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, तो भारत की सैन्य तैयारियां पूरी तरह से आधुनिक और पर्याप्त होनी चाहिए। चीन के किसी भी वादे या घोषित स्वरूप पर आँख मूँद कर भरोसा करने के बजाय जमीनी हकीकत पर आधारित रक्षा नीति ही भारत के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प है।
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