चीन और उत्तर कोरिया के बीच 10 साल बाद खुला 'दोस्ती का पुल', व्यापार में आएगी तेजी विश्व 3 घंटे पहले 7
चीन और उत्तर कोरिया के बीच एक नए पुल का उद्घाटन हो गया है, जो एक दशक से अधिक के इंतजार के बाद आवाजाही के लिए खोला गया है। यह पुल दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को नई ऊंचाई देने के साथ ही कूटनीतिक नजदीकियों का प्रतीक माना जा रहा है।

पुल का उद्घाटन और नई शुरुआत

चीन और उत्तर कोरिया के बीच संपर्क को एक नया आयाम देते हुए 15 अक्टूबर को एक महत्वपूर्ण पुल का उद्घाटन किया गया है। यह पुल दोनों देशों के बीच पनपे कूटनीतिक संबंधों के नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है। उद्घाटन समारोह के दौरान पुल पर दोनों देशों के झंडे लगे हुए ट्रक तैनात किए गए थे, और दोनों देशों के आला अधिकारियों ने रिबन काटकर आधिकारिक रूप से इस मार्ग को व्यापार के लिए खोल दिया। यह चार लेन वाला पुल कुल तीन किलोमीटर लंबा है, जो चीन के उत्तर-पूर्वी शहर दांदोंग को उत्तर कोरिया के शहर सिनुइजू से सीधे जोड़ता है। इस पुल को लेकर दोनों देशों में काफी उत्साह देखा जा रहा है।

सहयोग और कूटनीतिक संदेश

चीन के प्रधानमंत्री ली छियांग ने इस अवसर पर एक वीडियो संदेश साझा किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस पुल का खुलना चीन और उत्तर कोरिया के संबंधों में एक नए चरण की शुरुआत है। उन्होंने इसे दोनों देशों के बीच पारंपरिक दोस्ती का एक ठोस प्रतीक करार दिया और सीमावर्ती क्षेत्रों में आपसी सहयोग को और अधिक मजबूती प्रदान करने की प्रतिबद्धता जताई। वहीं, दूसरी ओर उत्तर कोरिया के प्रधानमंत्री पाक थाए सॉन्ग ने भी अपने वीडियो संबोधन में इस पुल को दोनों देशों की समृद्धि और आम नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार लाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम बताया। दोनों ही पक्षों ने इसे व्यापारिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए एक अनिवार्य कड़ी के रूप में देखा है।

एक दशक लंबा इंतजार

इस परियोजना की शुरुआत काफी पहले हुई थी, लेकिन कई कारणों से यह 10 साल से लंबित थी। दरअसल, इस पुल का निर्माण कार्य मूल रूप से 2014 में ही पूरा होकर खुल जाना चाहिए था। चीन ने अपनी ओर का निर्माण समय पर पूरा कर लिया था, लेकिन उत्तर कोरिया की ओर से निर्माण कार्यों में देरी देखी गई। उस समय विशेषज्ञों का मानना था कि प्योंगयांग चीन पर अपनी अत्यधिक आर्थिक निर्भरता को लेकर शायद संकोच में था। इसके अतिरिक्त, संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को लेकर चीन की सख्त नीतियों से भी उत्तर कोरिया के असंतोष की अटकलें लगाई गई थीं। इस देरी ने न केवल दांदोंग के स्थानीय निवासियों को निराश किया, बल्कि चीनी मीडिया के प्लेटफॉर्म ग्लोबल टाइम्स में भी इसे लेकर काफी आलोचनात्मक रिपोर्टें छपी थीं। दांदोंग के लोग इस उम्मीद में थे कि यह पुल उनके स्थानीय व्यापार को नई गति देगा, जो इतने लंबे समय के बाद अब साकार हो रही है।

व्यापारिक और क्षेत्रीय प्रभाव

यह नया पुल मौजूदा पुराने पुल का दबाव कम करने में काफी मददगार साबित होगा। गौरतलब है कि दांदोंग और सिनुइजू के बीच होने वाले करीब 70 प्रतिशत से अधिक आधिकारिक व्यापार का भार फिलहाल एक पुराने पुल पर ही है। वह पुराना पुल रेल और सड़क मार्ग दोनों के लिए इस्तेमाल होता है, जिसकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि वहां वाहन एक बार में केवल एक ही दिशा में चल सकते हैं। नए चार लेन वाले पुल के खुल जाने से न केवल यातायात सुगम होगा, बल्कि माल ढुलाई की रफ्तार भी काफी बढ़ जाएगी। सियोल के विशेषज्ञ लीफ-एरिक ईस्ली के अनुसार, हालांकि यह पुल अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों और प्रतिबंधों के दायरे में काम करेगा, फिर भी इससे पारदर्शी व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा, एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इस पुल के खुलने के महज एक महीने पहले ही रूस और उत्तर कोरिया ने भी एक सड़क पुल खोला था, जो क्षेत्रीय समीकरणों को रोचक बनाता है।

बदलते समीकरण और भविष्य की राह

हालांकि चीन लंबे समय से उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में किम जोंग उन ने रूस के साथ अपने संबंधों को अधिक प्राथमिकता दी है। यूक्रेन संघर्ष के दौरान उत्तर कोरिया द्वारा रूस को सैन्य सहायता और हथियार मुहैया कराए जाने के बाद दोनों के बीच सैन्य और आर्थिक सहयोग का नया युग शुरू हुआ है। इसके बावजूद, विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्थिक रूप से चीन की अहमियत को नजरअंदाज करना उत्तर कोरिया के लिए असंभव है। आंकड़े बताते हैं कि 2025 में उत्तर कोरिया के कुल विदेशी व्यापार का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा चीन के साथ ही था। दक्षिण कोरियाई सरकार के आंकड़ों के अनुसार, दोनों देशों के बीच 1400 किलोमीटर लंबी सीमा पर कम से कम 17 सड़क और रेल लिंक वर्तमान में सक्रिय हैं। यह पुल चीन की उस कोशिश का हिस्सा है, जिसके जरिए वह उत्तर कोरिया पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। कुल मिलाकर, यह पुल केवल ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि उत्तर कोरिया के लिए एक अपरिहार्य आर्थिक जीवन रेखा के रूप में उभरा है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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