चना किसान सावधान: बुवाई से पहले नहीं किया बीज और मिट्टी का उपचार, तो फसल को हो सकता है भारी नुकसान भारत एक घंटा पहले 6
रबी सीजन में चने की खेती करने वाले किसान उकठा रोग से बचाव के लिए बुवाई से पूर्व बीज और भूमि का उपचार जरूर करें, कृषि वैज्ञानिकों ने दिया सुझाव।

रबी सीजन में फसल चयन और सावधानियां

रबी की फसल की बुवाई का समय किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि किसानों को अपने क्षेत्र के मौसम, मिट्टी की गुणवत्ता और सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी की मात्रा का पूरा ध्यान रखना चाहिए। अजमेर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. धर्मेंद्र भाटी ने किसानों को सलाह दी है कि वे सोच-समझकर ही अपनी फसल का चयन करें। जिन क्षेत्रों में पानी की कमी है, वहां किसानों को ऐसी फसलों को प्राथमिकता देनी चाहिए जो कम सिंचाई में भी बेहतर पैदावार देने में सक्षम हों।

चने की फसल और उकठा रोग का खतरा

चने की खेती में सबसे बड़ी चुनौती उकठा रोग की होती है। इस रोग के कारण पूरी फसल के बर्बाद होने का खतरा बना रहता है। इस बीमारी से बचने के लिए बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना बहुत जरूरी है। डॉ. भाटी के अनुसार, किसान अगर बुवाई के शुरुआती चरण में ही एहतियात बरतें, तो रोग के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए ट्राइकोडर्मा का उपयोग करना सबसे प्रभावी उपाय माना गया है। बीज उपचार करने से मिट्टी में मौजूद हानिकारक फफूंद के प्रभाव को नियंत्रित करने में मदद मिलती है, जिससे फसल स्वस्थ रहती है और पैदावार अच्छी मिलती है।

ट्राइकोडर्मा से भूमि उपचार की सही विधि

चने की फसल को सुरक्षित रखने के लिए केवल बीज ही नहीं, बल्कि भूमि का उपचार करना भी अनिवार्य है। वैज्ञानिक ने इसके लिए एक सरल और प्रभावी तरीका बताया है। किसान को ढाई किलो ट्राइकोडर्मा लेना चाहिए और उसे 100 किलो गोबर की खाद के साथ अच्छी तरह से मिलाना चाहिए। इस तैयार मिश्रण को सात दिन तक सुरक्षित रखना चाहिए। एक सप्ताह बाद इस मिश्रण को खेत में समान रूप से बिखेर देना चाहिए और उसके बाद चने की बुवाई करनी चाहिए। यह विधि न केवल खेत में ट्राइकोडर्मा की सक्रियता को बढ़ाती है, बल्कि उकठा रोग के प्रकोप को भी प्रभावी रूप से कम करती है।

कम पानी में बेहतर उपज के विकल्प

डॉ. भाटी ने उन किसानों का विशेष मार्गदर्शन किया जिनके पास जल संसाधनों की कमी है। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे किसानों को कम समय में पककर तैयार होने वाली फसलों का चुनाव करना चाहिए। सरसों और चना इसके लिए सबसे उपयुक्त फसलें हैं, क्योंकि ये दोनों ही कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती हैं। किसान अगर सरसों और चने की जल्दी पकने वाली उन्नत किस्मों का चयन करते हैं, तो वे उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं और सीमित पानी में भी लाभप्रद खेती कर सकते हैं।

गेहूं की खेती और पानी की उपलब्धता

फसल चयन के मुद्दे पर बात करते हुए वैज्ञानिक ने स्पष्ट किया कि गेहूं की फसल को पानी की अधिक आवश्यकता होती है। इसलिए, जिन इलाकों में सिंचाई की भरपूर सुविधा उपलब्ध है, केवल उन्हीं क्षेत्रों के किसानों को गेहूं की बुवाई को प्राथमिकता देनी चाहिए। कम पानी वाले क्षेत्रों में गेहूं के बजाय सरसों और चने का चुनाव करना ही बुद्धिमानी है। सही फसल और किस्म का चयन करके किसान अपनी सीमित पानी की उपलब्धता में भी उत्पादन को सुरक्षित कर सकते हैं। इस प्रकार की वैज्ञानिक सलाह का पालन करके किसान रबी सीजन में अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं और संभावित नुकसान से बच सकते हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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