मध्य प्रदेश
2 घंटे पहले
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विचारों
हरछठ का आध्यात्मिक महत्व
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में हरछठ का पर्व महिलाओं के लिए अत्यंत आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। यह विशेष त्योहार भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस व्रत की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि महिलाएं इसमें उन खाद्य पदार्थों का सेवन बिल्कुल नहीं करतीं, जो हल की जुताई के माध्यम से पैदा हुए हों। इस दिन का मुख्य उद्देश्य संतान की लंबी आयु, बेहतर स्वास्थ्य और उनके सुखद भविष्य की कामना करना होता है। जिन दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति में बाधा आती है, वे भी इस व्रत को पूर्ण निष्ठा के साथ करते हैं। इस वर्ष हरछठ का पावन पर्व 2 सितंबर को मनाया जा रहा है।
हल से उपजे अन्न का त्याग
हरछठ व्रत की मर्यादा के अनुसार, व्रत रखने वाली महिलाएं हल से जोती गई किसी भी फसल का सेवन नहीं कर सकतीं। धार्मिक मान्यता है कि हल भगवान बलराम का शस्त्र है, इसलिए इस दिन हल से पैदा हुआ अन्न वर्जित माना जाता है। महिलाएं केवल उन चीजों का सेवन करती हैं जो स्वयं उगती हैं या जंगलों, कुंडों और तालाबों के आसपास प्राकृतिक रूप से पैदा होती हैं। 80 वर्षीय शकुंतला बताती हैं कि व्रत के दौरान उस मिट्टी से पैदा हुई कोई भी वस्तु नहीं खाई जाती, जहां हल चला हो। वे बताती हैं कि महिलाएं ऐसी खाद्य सामग्री की तलाश पहले से ही शुरू कर देती हैं, जो बिना जुताई वाली जमीन से प्राप्त होती है।
पूजा में सात प्रकार के अन्न का महत्व
इस व्रत में पूजा की सामग्री का विशेष महत्व है, जिसे जुटाने के लिए महिलाएं साल भर तैयारियां करती हैं। शकुंतला के अनुसार, हरछठ के दिन सात प्रकार के अन्न की विशेष पूजा की जाती है। इन सात अन्नों में मुख्य रूप से धान, गेहूं, मक्का, चना, मूंग दाल, सेमी दाल और अरहर दाल शामिल होती है। पूजा की इन सामग्रियों का चयन बहुत ही सावधानी से किया जाता है क्योंकि ये चीजें हर मौसम में आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं।
प्रसाद और आहार की विशेष परंपराएं
हरछठ के व्रत में खान-पान की परंपरा पूरी तरह से शुद्धता और प्रकृति से जुड़ी होती है। व्रत तोड़ने के लिए पसही के चावल का उपयोग किया जाता है, जो जंगली चावल के रूप में जाने जाते हैं। इसके साथ ही भैंस का दूध, दही और घी अनिवार्य माना गया है। विशेष शर्त यह है कि जिस भैंस का बच्चा जीवित है, केवल उसी के दूध और घी का उपयोग पूजा और सेवन के लिए किया जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के लिए भी बर्तनों के बजाय महुआ के पत्तों का उपयोग किया जाता है। सब्जी के रूप में जंगली पडोरा का सेवन किया जाता है, क्योंकि यह स्वतः उगने वाली वनस्पति है और काफी पौष्टिक होती है।
पूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्री
पूजा की विधि में शामिल की जाने वाली कई चीजें ऐसी हैं जिन्हें जंगल से खोजकर लाना पड़ता है। इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित चीजें शामिल हैं:
- कांस के फूल: यह एक विशेष प्रकार की घास है जो खेतों के किनारे उगती है।
- बेर की छोटी झाड़ियां: पूजन सामग्री में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
- महुआ के फूल और पत्ते: प्रसाद वितरण और भोजन के लिए।
- पसही का चावल: जो जंगलों से एकत्र किया जाता है।
- भैंस के उत्पाद: दूध, दही और घी।
- दातून: शुद्धता के लिए इसका भी उपयोग किया जाता है।
पंडितों का दृष्टिकोण और मान्यताओं का आधार
पंडित रमाकांत दीक्षित बताते हैं कि छतरपुर क्षेत्र में हरछठ की परंपरा भगवान बलराम के प्रति समर्पण को दर्शाती है। चूँकि इस दिन भगवान बलराम का जन्म हुआ था, इसलिए महिलाएं संतान के सौभाग्य के लिए इस व्रत का संकल्प लेती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हल भगवान बलराम का शस्त्र है, इसलिए हल से जोती गई जमीन पर उगे अन्न को न खाना इस दिन के व्रत का सबसे कड़ा नियम है। इसी कारण महिलाएं तालाबों, जलाशयों और वनों में स्वतः उगे अनाजों का सेवन करती हैं। मान्यता यह भी है कि यदि महिलाएं हाथ की दो उंगलियों से कांस में गांठ लगाती हैं, तो उनके लिए संतान प्राप्ति के योग प्रबल हो जाते हैं। यह पर्व न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान प्रकट करने का एक अनूठा माध्यम भी है।
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