बिहार
3 घंटे पहले
2
विचारों
पारंपरिक खेती से हटकर नकदी फसलों पर ध्यान
बिहार के छपरा जिले में किसानों का एक बड़ा वर्ग अब पारंपरिक खेती की सीमित कमाई से बाहर निकलकर प्रगतिशील खेती की ओर कदम बढ़ा रहा है। यहां के किसान अब धान, गेहूं और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों के स्थान पर ऑर्गेनिक तरीके से नकदी फसलों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। जिला प्रशासन और कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में किसानों को जहर मुक्त खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य न केवल भूमि की उर्वरक शक्ति को बचाना है, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति को भी सुदृढ़ करना है।
ऑर्गेनिक खेती के आर्थिक लाभ
पारंपरिक खेती में किसानों को सबसे बड़ी चुनौती भारी लागत और कम मुनाफे की होती है। धान और गेहूं जैसी फसलों में सिंचाई, कीटनाशकों और रासायनिक खाद पर भारी खर्च होता है, जिसके बाद भी मेहनत के अनुपात में उचित रिटर्न नहीं मिल पाता है। इसके विपरीत, नकदी फसलों जैसे लौकी, करेला, नेनुआ और बरबटी की जैविक खेती में लागत बहुत कम आती है। किसान अपने खेतों और आसपास उपलब्ध गोबर, गोमूत्र और अन्य खरपतवारों से जैविक खाद स्वयं तैयार कर लेते हैं। इस खाद को तैयार करने में मात्र 200 से 500 रुपये का खर्च आता है, जबकि रासायनिक खाद के उपयोग में 10,000 से 15,000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं। यह बचत सीधे तौर पर किसान की शुद्ध कमाई में वृद्धि करती है।
मिट्टी की उर्वरक शक्ति में सुधार
विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक खाद का उपयोग न केवल तत्काल फसल के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह दीर्घकालिक रूप से मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए भी वरदान है। यदि कोई किसान लगातार 5 सालों तक जैविक खाद का उपयोग करता है, तो खेत की प्राकृतिक उर्वरक क्षमता अपने आप बढ़ जाती है। इसके बाद किसान को बाहरी खाद पर निर्भर रहने की आवश्यकता लगभग खत्म हो जाती है। जैविक विधि से उगाई गई सब्जियां न केवल भरपूर मात्रा में पैदा होती हैं, बल्कि इनका स्वाद और गुणवत्ता भी बाजार में उपलब्ध रासायनिक उत्पादों से कहीं बेहतर होती है।
नकद आमदनी का नया जरिया
पारंपरिक खेती में किसान अपनी फसल को केवल सीजन में एक बार ही बेच पाते हैं, जबकि नकदी फसलों की विशेषता यह है कि किसान प्रतिदिन सब्जी तोड़कर बाजार में बेच सकते हैं। इससे उन्हें हर दिन नकद आमदनी प्राप्त होती है। इस दैनिक आय के कारण उन्हें अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए किसी और पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। गारखा प्रखंड के अढूपुर गांव के निवासी किसान सुरेंद्र कुमार सिंह इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर ऑर्गेनिक तरीके से सब्जी की खेती को अपनाया है।
बरबटी की खेती से शानदार कमाई
किसान सुरेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने खेत में लोकल वैरायटी की हरी बरबटी लगाई है, जिसे स्थानीय भाषा में 'बरो' कहा जाता है। उन्होंने बताया कि मात्र 8 से 10 इंच का पौधा होने पर भी यह भरपूर फलन दे रहा है। एक कट्ठा भूमि से किसान लगभग डेढ़ क्विंटल तक उपज प्राप्त कर लेते हैं। 10 कट्ठा खेत में लगी फसल से वे हर एक से दो दिन के अंतराल पर उपज को बाजार में बेचते हैं। इस किस्म की बुवाई के मात्र 45 दिन बाद से ही फसल फल देने लगती है। यह पूरी फसल अवधि लगभग 90 दिनों की होती है। एक कट्ठा खेत में बरबटी की खेती पर कुल 600 से 800 रुपये का ही खर्च आता है, जबकि पहली दो बार की तुड़ाई बेचने से ही पूरी लागत निकल आती है।
स्वस्थ जीवन और बेहतर आय का संगम
ऑर्गेनिक पद्धति से उगाई गई सब्जियों की मांग बाजार में सबसे ज्यादा रहती है, क्योंकि ये देखने में भी हरी-भरी होती हैं और खाने में भी स्वादिष्ट व स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित मानी जाती हैं। आज के समय में किसी फैक्ट्री में 8 से 12 घंटे की मेहनत भरी नौकरी करने के बजाय, किसान अपने घर के पास 1 एकड़ भूमि पर इन सब्जियों की खेती करके आसानी से प्रति माह 20 से 30 हजार रुपये कमा रहे हैं। यह खेती न केवल परिवार को आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर रही है, बल्कि समाज को जहर मुक्त भोजन भी उपलब्ध करा रही है।
Comments
0 comment