बिहार का देसी जुगाड़: बाइक से ढो रहे 150 किलो पाइप और इंजन, 10 लोगों का काम अब बस 2 भाई निपटा रहे बिहार एक महीने पहले 43
छपरा के दो भाइयों ने एक अनोखा जुगाड़ तैयार किया है, जिससे भारी-भरकम कृषि उपकरण और पाइप ले जाने का काम बेहद आसान हो गया है। इस तकनीक ने खेती से जुड़े कठिन कामों में न केवल समय बचाया है, बल्कि अब यह पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गई है।

छपरा के युवाओं का कमाल

बिहार की धरती से अक्सर ऐसे अविष्कार सामने आते हैं जो दुनिया को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। एक बार फिर 'एक बिहारी सौ पर भारी' की कहावत छपरा के दो भाइयों ने अपने अनूठे इनोवेशन से साबित कर दी है। मांझी प्रखंड के जैतपुर गांव के रहने वाले जय बाबू और मनोज कुमार ने एक ऐसा जुगाड़ तैयार किया है, जिसने खेती-किसानी के भारी कामों को चुटकियों में आसान बना दिया है। आमतौर पर खेतों तक पंपसेट इंजन और भारी डिलीवरी पाइप ले जाने के लिए कई मजदूरों की जरूरत पड़ती थी, लेकिन इन भाइयों ने बाइक के साथ एक ऐसा तालमेल बैठाया है कि अब यह काम दो लोग ही आसानी से कर लेते हैं।

कैसे काम करता है यह अनोखा जुगाड़

जय बाबू और मनोज कुमार पिछले 3 वर्षों से इस तरीके का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस जुगाड़ की प्रक्रिया काफी दिलचस्प है। ये दोनों भाई अपनी बाइक का उपयोग न केवल सवारी के लिए, बल्कि सामान ढोने वाली गाड़ी के रूप में भी कर रहे हैं। बाइक के पीछे एक पंपसेट इंजन को टोचन कर यानी बांधकर ले जाया जाता है। इसके अलावा, बाइक पर बैठने वाली जगह पर बीच में लगभग 100 से 150 किलोग्राम वजन वाले डिलीवरी पाइपों का गट्ठर रखा जाता है। इस तरह एक बाइक एक साथ इंजन और भारी पाइप दोनों को ढोकर खेत तक पहुंच जाती है।

श्रम और समय की बड़ी बचत

स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले जिस काम को पूरा करने के लिए कम से कम 5 से 10 मजदूरों की आवश्यकता पड़ती थी, उस काम को अब ये दोनों भाई अकेले ही अंजाम दे देते हैं। इस इनोवेशन से न सिर्फ मजदूरों का खर्च बचा है, बल्कि समय की भी भारी बचत हुई है। खेती के व्यस्त समय में जब किसानों के पास मजदूरों की कमी होती है, तब यह जुगाड़ उनके लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं होता है। बाइक की मदद से कोसों दूर स्थित खेतों तक इन भारी मशीनों को ले जाना अब बेहद सहज हो गया है।

जिले भर में लोकप्रिय हुआ यह प्रयोग

आज स्थिति यह है कि जय बाबू और मनोज कुमार का यह तरीका छपरा जिले भर में मशहूर हो चुका है। अब तो कई अन्य किसान और लोग भी इसी तरह का जुगाड़ लगाकर अपने कृषि उपकरणों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से ले जा रहे हैं। मनोज कुमार का कहना है कि शुरुआत में जब उन्होंने यह प्रयोग करना शुरू किया था, तो लोग उनकी तरफ देखकर मुस्कुराते थे या मजाक उड़ाते थे, लेकिन जब लोगों ने देखा कि इससे काम कितनी सरलता से हो रहा है, तो धीरे-धीरे वे भी इसे अपनाने लगे।

जुगाड़ से हल होती हैं बड़ी चुनौतियां

मनोज कुमार के अनुसार, उन्होंने और उनके भाई ने न केवल खुद के काम को आसान बनाया, बल्कि समाज के सामने एक उदाहरण पेश किया कि कैसे सीमित संसाधनों में बड़ी चुनौतियों का समाधान निकाला जा सकता है। उनका मानना है कि जुगाड़ तकनीक का सही उपयोग मेहनत और पैसा दोनों बचाता है। आज जब लोग उनके इस प्रयास को अपना रहे हैं, तो उन्हें काफी गर्व महसूस होता है। उन्होंने यह भी बताया कि उनका प्रयास हमेशा रहता है कि जीवन के हर कठिन कार्य को किसी न किसी जुगाड़ के माध्यम से सरल किया जाए। यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। लोग पहले हंसते हैं और बाद में खुद भी वही तकनीक इस्तेमाल करते हुए नजर आते हैं, जो इस प्रयोग की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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