जीरो डाउन पेमेंट ऑफर का असली सच: नई कार खरीदने से पहले जान लें ये बातें, बच सकते हैं लाखों रुपये ऑटो एक घंटा पहले 1
बिना डाउन पेमेंट नई कार घर लाने का ऑफर देखने में जितना आकर्षक है, उसके पीछे ऊंचा ब्याज, भारी चार्ज और वित्तीय जोखिम छिपे रहते हैं। जानिए वह हकीकत जो विज्ञापन कभी नहीं बताते।

त्योहारों का मौसम हो या साल खत्म होने का समय, कार डीलरों के विज्ञापनों में सबसे ज्यादा चमक 'जीरो डाउन पेमेंट' (Zero Down Payment) के ऑफर की रहती है। जेब से एक भी रुपया खर्च किए बिना चमचमाती नई कार घर ले जाने का सपना भला किसे नहीं लुभाएगा? मध्यम वर्गीय परिवारों को तो यह किसी लॉटरी से कम नहीं लगता। मगर वित्तीय दुनिया का एक साफ नियम है—मुफ्त में कुछ भी नहीं मिलता। जिसे आप पैसे न लगाने का 'शानदार मौका' समझ बैठते हैं, वह असल में लंबे समय में आपकी जेब खाली करने वाला सोचा-समझा जाल साबित हो सकता है। विज्ञापन की चकाचौंध के पीछे छिपी सच्चाई जाने बिना ऐसी डील पर हस्ताक्षर करना महंगा पड़ सकता है।

जो दिखता है, वह होता नहीं

जब कोई डीलर कहता है कि आपको डाउन पेमेंट नहीं देनी है, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं कि कार की कीमत घट गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि बैंक आपको कार की ऑन-रोड कीमत का पूरा 100% लोन दे रहा है। सामान्य लोन में आप कार की कीमत का 15% से 20% हिस्सा खुद चुकाते हैं और बाकी रकम का कर्ज लेते हैं। लेकिन जीरो डाउन पेमेंट में आपका मूलधन (Principal Amount) काफी बड़ा हो जाता है।

लोन जितना बड़ा, उस पर लगने वाला कुल ब्याज भी उतना ही ज्यादा। यानी शुरुआत में जो रकम आप बचाते दिखते हैं, उससे कहीं अधिक रकम आप अगले 5 से 7 सालों में ब्याज के रूप में बैंक को लौटा देते हैं।

छिपी हुई मुसीबतें: प्रोसेसिंग फीस और तगड़ा ब्याज

इस लुभावने ऑफर के पीछे कई वित्तीय पेच होते हैं, जिन्हें डीलर अक्सर बारीक अक्षरों (Fine Print) में दबा देते हैं।

  • ऊंची ब्याज दरें: बैंक बिना डाउन पेमेंट के दिए जाने वाले लोन को 'हाई रिस्क' मानते हैं। इस जोखिम की भरपाई के लिए वे सामान्य ऑटो लोन के मुकाबले 1% से 3% तक अधिक ब्याज वसूलते हैं। देखने में यह अंतर मामूली लगता है, लेकिन 5-7 साल की अवधि में यह लाखों रुपये का अतिरिक्त बोझ बन जाता है।
  • भारी प्रोसेसिंग फीस: इन योजनाओं में प्रोसेसिंग फीस और डॉक्यूमेंटेशन चार्ज प्रायः काफी ज्यादा होते हैं। कई बार डीलर इस रकम को सीधे आपकी ईएमआई (EMI) में जोड़ देते हैं, जिससे तुरंत भनक नहीं लगती, पर जेब लगातार कटती रहती है।
  • अनिवार्य एक्सेसरीज और इंश्योरेंस: ऑफर का फायदा देने के बदले डीलर अक्सर शर्त रख देते हैं कि इंश्योरेंस और महंगी एक्सेसरीज उन्हीं से खरीदनी होंगी, जो बाजार भाव से कहीं ज्यादा महंगी पड़ती हैं।

'डेप्रिसिएशन' का झटका

नई कार जैसे ही शोरूम से बाहर निकलती है, उसकी रीसेल वैल्यू (Market Value) सीधे 10% से 15% तक गिर जाती है। अगर आपने 100% लोन लिया है, तो शुरुआती 2-3 सालों में हालत यह बनती है कि कार की बाजार कीमत उस रकम से कम हो जाती है, जितना लोन आपको अब भी बैंक को चुकाना बाकी है। वित्तीय भाषा में इसे 'अपसाइड-डाउन लोन' कहा जाता है।

अगर इसी दौरान कार का कोई हादसा हो जाए या आप उसे बेचना चाहें, तो इंश्योरेंस क्लेम से मिलने वाली राशि से भी आपका पूरा बैंक लोन नहीं चुकता हो पाएगा।

इस झंझट से कैसे बचें

अगर आप सचमुच पैसा बचाना चाहते हैं, तो इन बातों को गांठ बांध लें:

  • 20% डाउन पेमेंट जरूर करें: इससे आपका लोन अमाउंट घटेगा और कम ब्याज दर पर कर्ज मिल सकेगा।
  • खुद बैंक से बात करें: सीधे बैंकों के पास जाएं और उनके सामान्य कार लोन की तुलना डीलर के ऑफर से करें।
  • कुल लागत समझें: डीलर से लिखित में लें कि लोन पूरा होने तक आप कुल कितनी रकम (मूलधन + कुल ब्याज + फीस) अदा करेंगे।

निचोड़

'जीरो डाउन पेमेंट' दरअसल एक मार्केटिंग टूल भर है। कार तभी खरीदें जब आप ठीक-ठाक डाउन पेमेंट करने की स्थिति में हों, ताकि नई गाड़ी आपके लिए खुशियों की सवारी बने, न कि कर्ज और मानसिक तनाव का बोझ।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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