क्या आयुर्वेदिक उपचार से ओवरी सिस्ट का खात्मा संभव है? डॉक्टर ने बताया योग और पंचकर्म का असर स्वास्थ्य एक घंटा पहले 6
ओवेरियन सिस्ट महिलाओं में एक आम समस्या है, लेकिन इसे आयुर्वेद, पंचकर्म और जीवनशैली में बदलाव के जरिए ठीक किया जा सकता है। आयुर्वेदिक विशेषज्ञ चंचल शर्मा ने सिस्ट के प्रकार, लक्षणों और प्राकृतिक उपचार के बारे में विस्तार से जानकारी दी है।

ओवरी सिस्ट क्या है और क्यों होती है?

महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में ओवेरियन सिस्ट काफी आम है। सरल शब्दों में कहें तो ओवरी यानी अंडाशय के भीतर तरल पदार्थ से भरी एक थैली का विकसित होना ही सिस्ट कहलाता है। यह आकार में छोटी या बड़ी हो सकती है। चिकित्सा जगत के अनुसार, 15 से 45 वर्ष की आयु की महिलाओं में यह समस्या अक्सर देखी जाती है। अच्छी बात यह है कि अधिकतर मामलों में ये सिस्ट खतरनाक नहीं होते और समय के साथ अपने आप समाप्त हो जाते हैं। हालांकि, इनकी उत्पत्ति और प्रकार को समझना जरूरी है।

ओवेरियन सिस्ट बनने की प्रक्रिया

आयुर्वेदिक डॉक्टर चंचल शर्मा, जो आशा आयुर्वेद क्लीनिक से जुड़ी हैं, के अनुसार ओवरी में सिस्ट बनने के पीछे हार्मोनल असंतुलन मुख्य कारण है। हर महीने ओवरी में एक अंडा परिपक्व होता है और ओव्यूलेशन के दौरान बाहर आता है। यदि किसी कारणवश अंडा बाहर नहीं आ पाता, या अंडा निकलने के बाद जिस फॉलिकल थैली से वह बाहर आया था, वह बंद नहीं होती, तो उसमें तरल पदार्थ जमा होने लगता है। समय के साथ यही तरल पदार्थ एक गांठ या सिस्ट का आकार ले लेता है।

ओवेरियन सिस्ट के विभिन्न प्रकार

सिस्ट की प्रकृति के आधार पर इसके कई प्रकार बताए गए हैं:

  • फंक्शनल सिस्ट: इनमें फॉलिक्युलर और कॉर्पस ल्यूटियम शामिल हैं। ये सीधे तौर पर हार्मोन से जुड़े होते हैं और अक्सर ओव्यूलेशन प्रक्रिया के दौरान बनते हैं।
  • डर्मॉइड सिस्ट: इसे मैच्योर सिस्टिक टेराटोमा भी कहा जाता है। इसमें त्वचा, बाल या दांत जैसे एक्टोडर्मल टिश्यू पाए जा सकते हैं।
  • एंडोमेट्रियोमा ओवेरियन सिस्ट: यह समस्या एंडोमेट्रियोसिस के कारण होती है, जहां एंडोमेट्रियल टिश्यू जमा हो जाते हैं।
  • सिस्टाडेनोमा: ये ओवरी की ऊपरी सतह के एपिथेलियम से उत्पन्न होते हैं और इनमें सीरस या म्यूसिनस जैसे तरल भरे हो सकते हैं।
  • पॉलीसिस्टिक ओवरीज: PCOS से पीड़ित महिलाओं में यह अक्सर देखा जाता है, जहां ओवरी में कई छोटे-छोटे फॉलिकल्स जमा हो जाते हैं और ओव्यूलेशन की प्रक्रिया बाधित होती है।

सिस्ट की पहचान और मुख्य लक्षण

सिस्ट का सही समय पर पता चलना उपचार को आसान बनाता है। इसके लक्षणों को सामान्य और गंभीर श्रेणियों में बांटा जा सकता है।

सामान्य संकेत:

  • पेल्विक क्षेत्र में लगातार दर्द।
  • पेट का फूलना या भारीपन महसूस होना।
  • पीरियड्स का अनियमित होना।
  • संभोग के दौरान दर्द का अनुभव।
  • बार-बार पेशाब आने की इच्छा होना।

गंभीर संकेत (सावधान रहने योग्य):

  • अचानक उठने वाला तीव्र पेल्विक दर्द, जो सिस्ट फटने का संकेत हो सकता है।
  • पेट में तेज दर्द के साथ मतली या उल्टी आना, जो ओवेरियन टॉर्शन का लक्षण हो सकता है।
  • अचानक चक्कर आना या बेहोशी की स्थिति।

इसके अलावा कुछ गुप्त लक्षण भी हो सकते हैं जैसे शरीर में अत्यधिक थकान, पाचन संबंधी परेशानियां और स्तनों में कोमलता या दर्द महसूस होना। इन संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है।

आयुर्वेद और पंचकर्म से उपचार

डॉ चंचल शर्मा का मानना है कि आयुर्वेद में ओवरी सिस्ट का प्राकृतिक इलाज संभव है। इसके लिए पंचकर्म चिकित्सा को अत्यंत प्रभावी माना गया है, जिसमें पांच मुख्य क्रियाएं शामिल हैं:

  • वमन: गलत खानपान से शरीर में विषैले तत्व जमा हो जाते हैं। वमन यानी उल्टी के जरिए इन विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाला जाता है। यह प्रक्रिया शरीर को सक्रिय करती है और अस्थमा जैसी समस्याओं के साथ सिस्ट में भी राहत देती है।
  • विरेचन: इसमें आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन कराकर मल के रास्ते शरीर के दूषित तत्वों को बाहर निकाला जाता है।
  • नस्यम: इसमें नाक के माध्यम से आयुर्वेदिक ड्रॉप्स डाले जाते हैं, जो मस्तिष्क और सिर से संबंधित दोषों को दूर करते हैं। डिप्रेशन और ओवेरियन सिस्ट का गहरा संबंध होने के कारण यह पद्धति कारगर है।
  • रक्तमोक्षन: आयुर्वेदिक औषधियों की मदद से अशुद्ध रक्त को साफ किया जाता है, जिससे रक्त संचार बेहतर होता है और शरीर में नई कोशिकाओं का निर्माण तेजी से होता है।
  • अनुवासन बस्ती: यह पंचकर्म का आधार मानी जाती है। इसमें रोगी को पौष्टिक आहार दिया जाता है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और ऊर्जा का स्तर ऊंचा होता है।

जीवनशैली और योग का योगदान

सिस्ट के प्रबंधन में केवल दवाएं ही नहीं, बल्कि सही जीवनशैली भी जरूरी है। डॉ चंचल शर्मा ने बताया कि विशेषज्ञों की देखरेख में किया गया योग अण्डाशय की गांठों को ठीक करने में बहुत सहायक है। यदि योग को नियमित और सही ढंग से अपनाया जाए, तो 3 से 4 महीने के भीतर सकारात्मक परिणाम देखे जा सकते हैं। इसके अलावा आहार में बदलाव भी जरूरी है। दही का सेवन पेट की समस्याओं को कम करता है, जबकि अदरक का नियमित उपयोग सूजन को घटाने और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में सहायक है, जिससे सिस्ट को खत्म करने में मदद मिलती है।

डॉ. आलोक मिश्रा पाबना के स्वास्थ्य संवाददाता हैं और चिकित्सा, बीमारियों तथा वेलनेस से जुड़ी खबरों को प्रामाणिक तरीके से पाठकों तक पहुंचाते हैं। नई रिसर्च, इलाज और रोकथाम पर वे विशेषज्ञों के हवाले से सटीक जानकारी देते हैं। उनका जोर भरोसेमंद और जिम्मेदार स्वास्थ्य पत्रकारिता पर है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप