मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
1
विचारों
गर्मी के इस मौसम में लौकी, तोरई, कद्दू और खीरा जैसी कद्दूवर्गीय सब्जियों की व्यावसायिक खेती करने वाले किसानों के सामने एक नई परेशानी आ खड़ी हुई है। खेतों में लगी इन फसलों पर इन दिनों भूरी रोग का प्रकोप तेजी से फैल रहा है, जिसे दहिया रोग या पाउडरी मिल्ड्यू के नाम से भी जाना जाता है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर समय पर इस बीमारी पर काबू नहीं पाया गया तो यह फसल की पैदावार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है और किसानों को आर्थिक चोट पहुंचा सकती है।
क्या है भूरी रोग और कैसे होती है शुरुआत
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक शैलेंद्र गौतम के अनुसार, भूरी रोग एक फफूंद जनित बीमारी है, जो खास तौर पर कद्दूवर्गीय फसलों को अपनी चपेट में लेती है। इस रोग की शुरुआत पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद रंग के छोटे-छोटे धब्बों के रूप में होती है। शुरुआती दौर में ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी ने पत्तियों पर सफेद पाउडर बिखेर दिया हो। धीरे-धीरे यह सफेद परत पूरी पत्ती पर फैल जाती है और पौधे की सामान्य बढ़वार रुकने लगती है।
पत्तियां भूरी होकर सूख जाती हैं
वैज्ञानिक बताते हैं कि रोग बढ़ने के साथ पत्तियों की हरियाली खत्म होने लगती है। पहले पत्तियां पीली पड़ती हैं और बाद में भूरी होकर सूख जाती हैं। इससे पौधों की भोजन बनाने की प्रक्रिया यानी प्रकाश संश्लेषण बाधित होता है और नतीजतन पौधों का विकास थम जाता है। इसका सीधा असर यह होता है कि फल कम लगते हैं और उनकी गुणवत्ता भी गिर जाती है।
रोग की पहचान करना मुश्किल नहीं
ग्राम पाडरा के किसान संतोष सिंह सेंगर का कहना है कि इस बीमारी को पहचानना अपेक्षाकृत आसान है। यदि पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत दिखे और वह धीरे-धीरे पूरे पौधे में फैलने लगे, तो इसे अनदेखा करना भारी पड़ सकता है। समय रहते इलाज न होने पर पूरी फसल चपेट में आ सकती है।
रासायनिक उपचार अपनाने की सलाह
रोग पर नियंत्रण के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों को तुरंत रासायनिक उपचार अपनाने की सलाह दी है। वैज्ञानिक शैलेंद्र गौतम के मुताबिक, ‘थायोफैनेट मिथाइल 70 प्रतिशत डब्लूपी’ नामक फफूंदनाशी दवा इस बीमारी के नियंत्रण में कारगर साबित होती है। किसानों को दो ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर संक्रमित फसल पर छिड़काव करना चाहिए। सही मात्रा और उचित समय पर किया गया छिड़काव रोग को फैलने से रोकने में मददगार होता है।
खेतों की नियमित निगरानी जरूरी
कृषि वैज्ञानिक ने किसानों से अपील की है कि वे खेतों की नियमित रूप से निगरानी करते रहें। फसल की समय-समय पर जांच करने से रोग की पहचान शुरुआती अवस्था में ही हो जाती है, जिससे होने वाले नुकसान को काफी हद तक टाला जा सकता है। सही जानकारी, सतर्कता और समय पर किया गया उपचार ही किसानों की मेहनत और फसल को सुरक्षित रखने का सबसे असरदार तरीका है।
Comments
0 comment