भारत
59 मिनट पहले
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विचारों
24 मई 1941 का दिन था और उत्तरी अटलांटिक का समुद्र युद्ध की लपटों में घिरा हुआ था। जर्मनी का विशालकाय युद्धपोत बिस्मार्क ब्रिटिश नौसेना के ठीक सामने डटा खड़ा था। महज कुछ घंटों के भीतर इस जहाज ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना दुनिया ने नहीं की थी।
"डेनमार्क स्ट्रेट" में हुई इस लड़ाई के दौरान बिस्मार्क ने ब्रिटिश नौसेना की शान कहे जाने वाले युद्धपोत "HMS Hood" को समुद्र की गहराई में पहुंचा दिया। सिर्फ इतना ही नहीं, उसने ब्रिटेन के नए और अत्याधुनिक युद्धपोत "Prince of Wales" को भी मैदान छोड़कर पीछे हटने को विवश कर दिया। इस घटना के बाद बिस्मार्क का नाम दुनिया के सबसे चर्चित और सबसे खतरनाक युद्धपोतों की सूची में दर्ज हो गया।
आकार में भारी, रफ्तार में भी आगे
उस दौर में दुनिया की प्रमुख नौसैनिक ताकतें कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों के जरिए युद्धपोतों के आकार पर सीमाएं तय करने की कोशिश में जुटी थीं। लेकिन बिस्मार्क इन तय सीमाओं से कहीं बड़ा था। इसका मानक वजन करीब 41,700 टन था, जो उस समय के ज्यादातर आधुनिक युद्धपोतों से अधिक था। केवल बाद में बनी अमेरिकी "आयोवा श्रेणी" और जापान की विशाल "यामाटो श्रेणी" के युद्धपोत ही उससे बड़े साबित हुए। आकार के लिहाज से बिस्मार्क अपने समय के सबसे प्रभावशाली युद्धपोतों में शुमार था।
रफ्तार भी इसकी एक बड़ी खूबी थी। यह लगभग 56 किमी प्रति घंटा की गति से लगातार आगे बढ़ सकता था, जो उस समय के अधिकांश युद्धपोतों के सामने बेहद शानदार प्रदर्शन माना जाता था। फ्रांस के रिचलियू और इटली के विट्टोरियो वेनेटो जैसे गिने-चुने युद्धपोत ही उसकी इस गति की बराबरी कर पाते थे।
आसानी से हार नहीं मानता था बिस्मार्क
बिस्मार्क की असली ताकत सिर्फ उसका आकार या उसकी तेज रफ्तार नहीं थी, बल्कि उसकी बेहद मजबूत सुरक्षा प्रणाली भी थी। इसके ढांचे को कई हिस्सों में बांटा गया था, जिसके चलते भारी नुकसान झेलने के बाद भी उसे डुबाना आसान नहीं था। बाद में जब ब्रिटिश नौसेना ने उसे चारों ओर से घेर लिया, तब भी उसका अंत करने के लिए भारी गोलाबारी और टॉरपीडो हमलों का सहारा लेना पड़ा। यही कारण था कि उसे अपने दौर के सबसे सुरक्षित युद्धपोतों में गिना जाता था।
हथियारों के मोर्चे पर अलग ही कहानी
भले ही बिस्मार्क की छवि एक बेहद शक्तिशाली युद्धपोत की थी, लेकिन अगर सिर्फ तोपों की संख्या और एक साथ दागे जाने वाले गोलों के वजन को आधार बनाया जाए, तो कुछ दूसरे देशों के युद्धपोत उससे आगे ठहरते थे। बिस्मार्क के पास आठ 15-इंच की मुख्य तोपें थीं। इन तोपों के जरिए वह एक बार में करीब 6,400 किलोग्राम स्टील और विस्फोटक दुश्मन की ओर दाग सकता था। लेकिन कुछ अमेरिकी, जापानी और ब्रिटिश युद्धपोत इससे भी ज्यादा वजन की गोलाबारी करने में सक्षम थे।
जापान के विशाल यामाटो और मुसाशी युद्धपोतों के पास 18-इंच की नौ विशाल तोपें थीं, जिनकी एक साथ की गई गोलाबारी का वजन बिस्मार्क की तुलना में दोगुने से भी अधिक था। द्वितीय विश्व युद्ध में ऐसे कई युद्धपोत शामिल थे जो बिस्मार्क से भारी गोले दाग सकते थे। इसके बावजूद युद्ध के मैदान में बिस्मार्क ने जो असर छोड़ा, उसी ने उसे एक अलग पहचान दिलाई।
अमेरिकी युद्धपोतों से तुलना
अमेरिका के नॉर्थ कैरोलाइना और साउथ डकोटा श्रेणी के युद्धपोत आकार में बिस्मार्क से छोटे जरूर थे, लेकिन उनकी मारक क्षमता ज्यादा मानी जाती थी। सिद्धांत के स्तर पर देखें तो आमने-सामने की लड़ाई में वे बिस्मार्क को कड़ी टक्कर दे सकते थे। हालांकि जर्मन नौसेना के फायर कंट्रोल सिस्टम और ऑप्टिकल उपकरणों की गुणवत्ता भी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी। यही वजह है कि सिर्फ आंकड़ों के सहारे किसी एक युद्धपोत को निर्णायक रूप से बेहतर बता पाना आसान नहीं था।
जब Prince of Wales पर टूट पड़ी बिस्मार्क की आग
डेनमार्क स्ट्रेट की लड़ाई के दौरान बिस्मार्क ने Prince of Wales पर कई सटीक वार किए। उसके 15-इंच के चार गोले ब्रिटिश युद्धपोत से टकराए। एक गोला जहाज के नीचे पानी में लगा, जिससे कुछ जलभराव हो गया। दो अन्य गोले जहाज के ऊपरी हिस्सों में लगे, जिससे वहां मौजूद उपकरण नष्ट हो गए और कई नौसैनिक हताहत हुए। चौथा गोला जहाज के एक हिस्से से टकराकर फटा और आसपास के इलाकों में भारी नुकसान पहुंचा।
इन हमलों के बावजूद "Prince of Wales" की मुख्य तोपें चलती रहीं और उसने लड़ाई जारी रखी। इसी बीच जर्मन भारी क्रूजर "Prinz Eugen" के गोले भी Prince of Wales पर पड़े, जिससे जहाज को और अधिक क्षति पहुंची। लगातार बरसते गोलों और दोनों जर्मन जहाजों की गोलाबारी ने ब्रिटिश युद्धपोत की कार्रवाई पर असर डाला। आखिरकार हालात ऐसे बन गए कि Prince of Wales को युद्धक्षेत्र से हटना पड़ा।
फिर भी पीछा नहीं छोड़ा ब्रिटिश युद्धपोत ने
Prince of Wales को नुकसान जरूर पहुंचा था, लेकिन उसकी मुख्य तोपें और इंजन सुरक्षित बचे रहे। कुछ देर बाद उसने दोबारा अपनी दिशा बदली और जर्मन बेड़े का पीछा कर रहे ब्रिटिश जहाजों के साथ आ मिला। बिस्मार्क की गोलाबारी से हुई क्षति की मरम्मत के बाद Prince of Wales ने खुद को फिर से संचालन योग्य घोषित किया और जर्मन युद्धपोत का पीछा जारी रखा।
लेकिन तब तक बिस्मार्क दुनिया भर के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन कर चुका था। HMS Hood का विनाश और Prince of Wales को पीछे हटने पर मजबूर करने की घटनाओं ने उसे द्वितीय विश्व युद्ध के सबसे चर्चित और सबसे भयावह युद्धपोतों की कतार में खड़ा कर दिया था।
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