छत्तीसगढ़
एक महीने पहले
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विचारों
बिलासपुर में मानवीय गरिमा तार-तार
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के सरकंडा स्थित जबड़ापारा मुक्तिधाम से एक अत्यंत विचलित करने वाली और शर्मनाक स्थिति सामने आई है। यहाँ लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के कारण मृत व्यक्तियों को मौत के बाद भी सम्मान नसीब नहीं हो रहा है। आलम यह है कि शवों को पर्याप्त गहराई में दफनाने के बजाय बहुत ही कम गहराई वाले गड्ढों में आनन-फानन में दफना दिया जाता है। इस लापरवाही का नतीजा यह हुआ है कि हाल ही में हुई बारिश के कारण कब्रों की मिट्टी बह गई और दफनाए गए शवों के अवशेष जमीन से बाहर आ गए।
आवारा जानवरों का बना निवाला
बारिश के बाद की स्थिति इतनी भयावह है कि जमीन से बाहर निकले मानव अवशेषों को आवारा कुत्ते नोचते देखे गए हैं। स्थानीय निवासियों के लिए यह दृश्य देखना न केवल पीड़ादायक है बल्कि उनके स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा बन गया है। पूरे मुक्तिधाम परिसर में भयंकर दुर्गंध फैली हुई है, जिसके कारण आसपास की बस्ती में रहने वाले लोग दहशत में हैं। लोगों का कहना है कि उन्होंने ऐसी अमानवीय घटना पहले कभी नहीं देखी, जहाँ कब्रों से हड्डियाँ और कपड़े बाहर निकल आए हों और आवारा पशु उन पर मंडरा रहे हों।
प्रशासन की लापरवाही और दावों की सच्चाई
स्थानीय जानकारी के अनुसार, बिलासपुर में हर महीने पुलिस की निगरानी में औसतन 10 से 12 लावारिस शवों को इसी मुक्तिधाम में दफनाया जाता है। अधिकारियों का तर्क है कि भविष्य में पहचान की संभावना को देखते हुए शवों को कम गहराई में दफनाया जाता है, लेकिन यह तर्क बारिश के मौसम में पूरी तरह से बेअसर साबित हो रहा है। प्रशासन का यह नियम ही अब सबसे बड़ी समस्या का कारण बन गया है। स्थानीय लोगों का स्पष्ट आरोप है कि यहाँ न तो कोई स्थायी कर्मचारी नियुक्त है और न ही मुक्तिधाम परिसर की उचित देखरेख की जाती है।
बढ़ती आबादी और सुरक्षा का अभाव
एक समय था जब जबड़ापारा मुक्तिधाम शहर की सीमा से काफी दूर स्थित था, लेकिन अब इस इलाके के चारों ओर घनी आबादी बस चुकी है। बस्ती के नजदीक होने के बावजूद, यहां न तो सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं और न ही अंतिम संस्कार के मानकों का पालन किया जा रहा है। मुक्तिधाम का मुख्य द्वार अक्सर खुला छोड़ दिया जाता है, जिससे आवारा पशुओं का परिसर के अंदर आना बेहद आसान हो गया है। निवासियों के अनुसार, यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही है और अब तक इसका कोई ठोस या स्थायी समाधान नहीं निकाला गया है।
नागरिकों की प्रशासन से कड़ा रुख अपनाने की मांग
मुक्तिधाम के आस-पास रहने वाले नागरिकों ने अब नगर निगम और जिला प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। स्थानीय लोगों की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:
- मुक्तिधाम परिसर में सुरक्षा के लिए बाउंड्री वॉल को दुरुस्त किया जाए और गेट पर ताला लगाने की व्यवस्था हो।
- शवों को दफनाने के लिए तय मानकों के अनुसार गड्ढे की गहराई कम से कम निर्धारित सीमा तक सुनिश्चित की जाए।
- परिसर की साफ-सफाई और निगरानी के लिए स्थायी तौर पर कर्मचारियों की तैनाती की जाए।
- मृतकों की गरिमा को ध्यान में रखते हुए दफन प्रक्रिया में संवेदनशीलता दिखाई जाए।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि किसी व्यक्ति के लावारिस होने का अर्थ यह नहीं है कि उसे सम्मान से विदाई न दी जाए। यह पूरी घटना न केवल प्रशासनिक तंत्र की विफलता को दर्शाती है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और नैतिकता के लिए भी एक गंभीर चिंता का विषय है। फिलहाल, बिलासपुर के इस मुक्तिधाम में फैली अव्यवस्था ने जिला प्रशासन की जवाबदेही को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
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