छत्तीसगढ़
3 महीने पहले
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फैसले की मुख्य बातें
बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील मामले में नाबालिग रेप पीड़िता को राहत प्रदान की है। कोर्ट ने पीड़िता को 25 सप्ताह की गर्भावस्था का गर्भपात कराने की अनुमति दे दी है। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि एक नाबालिग के लिए अनचाही गर्भावस्था को जारी रखने के लिए बाध्य करना उसके मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। इस मानवीय दृष्टिकोण के साथ हाईकोर्ट ने मेडिकल टीम को तत्काल आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
24 घंटे में प्रक्रिया पूरी करने के आदेश
हाईकोर्ट ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए स्वास्थ्य अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने आदेश दिया है कि पीड़िता को अगले 24 घंटे के भीतर किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जाए और गर्भपात की चिकित्सा प्रक्रिया को पूरी किया जाए। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे प्राथमिकता पर रखा।
मेडिकल बोर्ड का हुआ था गठन
इस कानूनी प्रक्रिया से पहले नाबालिग पीड़िता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए हाईकोर्ट ने रायपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को तत्काल प्रभाव से एक मेडिकल बोर्ड गठित करने के आदेश दिए थे। इस बोर्ड का काम पीड़िता का विस्तृत स्वास्थ्य परीक्षण करना था ताकि उसकी शारीरिक स्थिति का सही आकलन किया जा सके। कोर्ट ने इस मेडिकल रिपोर्ट को 20 जुलाई तक अदालत के समक्ष पेश करने को कहा था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला रायपुर जिले से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, आरोपी युवक ने पीड़िता को प्रेम के जाल में फंसाया था और शादी का झूठा वादा देकर उसका शारीरिक शोषण किया, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई। बाद में जब आरोपी ने शादी से साफ इनकार कर दिया, तो पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने पीड़िता की शिकायत के आधार पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज की और जांच के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।
न्याय की मांग और हाईकोर्ट का हस्तक्षेप
दुष्कर्म के मामले में न्याय मिलने के बाद भी पीड़िता के सामने गर्भावस्था की गंभीर चुनौती बनी हुई थी। अंततः उसने गर्भपात की अनुमति के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपनी याचिका में पीड़िता के पक्ष ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व के फैसलों का भी हवाला दिया था। इस न्यायिक हस्तक्षेप से नाबालिग पीड़िता को न केवल बड़ी राहत मिली है, बल्कि यह कानूनी रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि कोर्ट ने पीड़ित के मौलिक अधिकारों को सर्वोपरि रखा है। अब सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की देखरेख में पूरी प्रक्रिया संपन्न कराई जाएगी।
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