छत्तीसगढ़
एक घंटा पहले
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हाईकोर्ट से याचिकाकर्ताओं को लगा बड़ा झटका
छत्तीसगढ़ में सामने आए बहुचर्चित शराब घोटाले और उससे जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की कार्रवाई को बड़ी कानूनी मजबूती मिली है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें ED द्वारा गोवा में स्थित होटल वेस्टिन की प्रोविजनल अटैचमेंट यानी अंतरिम कुर्की को चुनौती दी गई थी। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि वर्तमान स्तर पर इस याचिका पर विचार करना उचित नहीं है, क्योंकि PMLA यानी प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत संपत्ति कुर्की के फैसलों की समीक्षा के लिए एक निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया पहले से मौजूद है। कोर्ट ने यह भी संज्ञान लिया कि ED इस मामले में अपनी शिकायत संबंधित एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी के समक्ष पहले ही दाखिल कर चुकी है।
110 करोड़ के लेनदेन का है पूरा मामला
यह पूरा विवाद 28 मई 2026 को जारी किए गए उस प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर से संबंधित है, जिसमें ED ने PMLA की धारा 5(1) के तहत गोवा के लक्जरी होटल वेस्टिन को जब्त किया था। जांच एजेंसी का यह ठोस दावा है कि शराब सिंडिकेट की मिलीभगत से जुटाई गई अवैध कमाई का इस्तेमाल इस होटल को खरीदने में किया गया था। एजेंसी की जांच के अनुसार, इस सौदे में कुल 110 करोड़ रुपए की हेराफेरी की गई थी। इसमें से 50 करोड़ रुपए का भुगतान रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से दिखाया गया, जबकि बाकी बचे 60 करोड़ रुपए का लेनदेन कैश यानी नकदी के रूप में हुआ था, जिसे एजेंसी ने अपराध की आय माना है।
याचिकाकर्ताओं के तर्क और कोर्ट की टिप्पणी
इस कुर्की के खिलाफ कारोबारी राहुल अग्रवाल और पैसिफिका होटल्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि होटल खरीद में इस्तेमाल किए गए 60 करोड़ रुपए पूरी तरह से वैध हैं और इस संबंध में आयकर विभाग के अधिकारियों के सामने पहले ही स्पष्टीकरण दिया जा चुका है। हालांकि, कोर्ट ने इन तर्कों पर अपना रुख साफ करते हुए कहा कि अदालत का काम इस चरण पर यह तय करना नहीं है कि ED अंततः मनी लॉन्ड्रिंग के लिंक को साबित कर पाएगी या नहीं। कोर्ट का मुख्य फोकस केवल इस बात पर था कि क्या ED के अधिकृत अधिकारी के पास PMLA की धारा 5(1) के तहत कार्रवाई के लिए विश्वास करने के पर्याप्त आधार यानी Reason to Believe मौजूद थे। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह इस मामले में कोई मिनी ट्रायल नहीं करेगी और न ही न्यायिक समीक्षा के दायरे में यह निर्णय लेगी कि उपलब्ध सामग्री मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त है या नहीं। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले के बाद अब मामला एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी के स्तर पर ही आगे बढ़ेगा।
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