बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
बिहार हमेशा से नए प्रयोगों और कीर्तिमानों के लिए जाना जाता रहा है। आजादी की लड़ाई हो या लोकतांत्रिक परंपराओं की बात, इस राज्य ने हर मोड़ पर अग्रणी भूमिका निभाई है। इस बार सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल विस्तार में दो ऐसे चेहरों को जगह मिली है, जिनका कुछ महीने पहले तक राजनीति से कोई सीधा नाता नहीं था। दिलचस्प यह है कि मंत्री बनने के लिए विधानमंडल के दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य होना जरूरी होता है, लेकिन ये दोनों चेहरे यह शर्त पूरी नहीं करते।
आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश दूसरी बार बिहार में मंत्री बने हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार ने भी मंत्री पद की शपथ ली है। कई लोग इसे नैतिकता के पैमाने पर तौल रहे हैं, मगर संवैधानिक प्रावधानों के लिहाज से दोनों का मंत्री बनना पूरी तरह जायज है। इसलिए इस पर सवाल खड़ा करना तार्किक रूप से सही नहीं ठहरता।
परंपरा की शुरुआत नीतीश ने की
विधानमंडल का सदस्य हुए बिना सरकार में शामिल होने की परंपरा बिहार में नीतीश कुमार ने वर्ष 2000 में शुरू की थी। 2026 तक आते-आते यह परंपरा खूब फली-फूली। 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद नीतीश के नेतृत्व में बनी सरकार में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के मुखिया उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश मंत्री बने। इसे परिवारवाद का उपयुक्त उदाहरण माना गया। उस समय भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे।
इस पर बहस चल ही रही थी कि नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद सम्राट चौधरी की अगुआई में बनी नई सरकार में दीपक एक बार फिर बिना किसी सदन का सदस्य हुए मंत्री बन गए। इतना ही नहीं, नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को भी आखिरकार मंत्री बनने से नहीं रोका, जबकि निशांत भी विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं हैं।
सांसद रहते बने मुख्यमंत्री
पहली बार जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे, तब भी वे विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं थे, हालांकि उस समय वे लोकसभा के सदस्य जरूर थे। यहां यह उल्लेख जरूरी है कि अपने लंबे राजनीतिक जीवन में नीतीश कुमार ने सिर्फ एक बार विधानसभा का चुनाव लड़ा है। 2001 से 15 अप्रैल 2026 तक वे सात-आठ महीने को छोड़कर लगातार मुख्यमंत्री रहे।
इससे पहले वर्ष 2000 में भी वे बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन तब महज सात दिन ही कुर्सी पर रह सके। बहुमत का आंकड़ा न जुटा पाने की वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उस वक्त वे न तो विधायक थे और न ही एमएलसी। यानी विधानमंडल का सदस्य हुए बिना मुख्यमंत्री या मंत्री बनने की नींव बिहार में नीतीश कुमार ने ही रखी थी।
दीपक-निशांत के साथ नया दौर
उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश और नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के बिना किसी सदन का सदस्य हुए मंत्री बनने के साथ यह सिलसिला ढाई दशक बाद नए सिरे से शुरू हुआ है। पहली बार जब दीपक मंत्री पद की शपथ लेने पहुंचे, तो उनके पहनावे और हाव-भाव से जरा भी नहीं लगा कि उन्हें इसकी पहले से कोई जानकारी थी। वे कुछ हड़बड़ाहट के अंदाज में शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे थे।
दरअसल भाजपा ने आरएलएम को बिहार में एक एमएलसी और एक मंत्री पद देने का वादा किया था। उपेंद्र कुशवाहा की इसी शर्त को मानते हुए भाजपा ने उनके बेटे को सीधे मंत्री बनाने की अनुमति दे दी। जब एमएलसी के उपचुनाव में खाली सीटों पर भाजपा ने अपना उम्मीदवार उतार दिया, तब दीपक के मंत्री पद पर संकट खड़ा हो गया था, क्योंकि एमएलसी की बाकी सीटों पर नियमित चुनाव में अभी देर थी।
संयोग से नीतीश ने राज्यसभा जाने के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। इसके बाद सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनी और दीपक प्रकाश के लिए अगले 6 महीने तक मंत्री पद सुरक्षित हो गया।
मान-मनौव्वल के बाद माने निशांत
नीतीश कुमार के बेटे निशांत के राजनीति में आने की चर्चा साल भर से चल रही थी। इसी साल मार्च में वे जेडीयू के सदस्य बने और हाल ही में पार्टी ने उन्हें बिहार के दौरे पर भेजा। पहले उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाने की बात हुई, लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। काफी मान-मनौव्वल के बाद उन्होंने मंत्रिमंडल में शामिल होने पर सहमति जताई।
सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल में निशांत को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया है। हालांकि उनकी स्थिति भी दीपक प्रकाश जैसी ही है, क्योंकि वे अब तक विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। दीपक प्रकाश को मंत्री बनाने का श्रेय नीतीश को जाता है, जबकि निशांत के लिए सहमति सम्राट चौधरी ने दी। बहरहाल, सम्राट के मंत्रिमंडल के इन दोनों सदस्यों ने एक तरह से इतिहास तो रच ही दिया है।
पीएम और सीएम के भी रहे उदाहरण
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और केंद्र व राज्य में संबंधित सदन का सदस्य रहे बिना मंत्री बनने की परंपरा काफी पुरानी है। एचडी देवगौड़ा 1996 में प्रधानमंत्री बने, जबकि उस समय वे संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे, बल्कि कर्नाटक विधानसभा के सदस्य थे। बाद में वे राज्यसभा के सदस्य बने। उनके प्रधानमंत्री बनने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने इसे वैध ठहराया।
नरेंद्र मोदी जब पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब वे भी विधानसभा के सदस्य नहीं थे और बाद में चुनाव लड़कर विधायक बने। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे भी विधानसभा का सदस्य हुए बिना मुख्यमंत्री बने थे। उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी भी इसी तरह बिना निर्वाचित हुए सीएम बने। यहां तक कि अरुण जेटली को 2014 का लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद वित्त और रक्षा मंत्री बनाया गया था और बाद में वे राज्यसभा के सदस्य बने।
संविधान क्या कहता है
भारतीय संविधान की धारा 75(5) (केंद्र) और 164(4) (राज्य) के तहत कोई व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने मंत्री या मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री बन सकता है, लेकिन उसे 6 महीने के भीतर किसी सदन — लोकसभा/राज्यसभा या विधानसभा/विधान परिषद — का सदस्य बनना अनिवार्य है। तय समय सीमा में अगर वह निर्वाचित या मनोनीत नहीं होता, तो उसे पद छोड़ना पड़ता है। इस प्रावधान का पहले भी कई बार इस्तेमाल हो चुका है।
दीपक प्रकाश और निशांत कुमार को बिहार कैबिनेट के हालिया विस्तार में मंत्री बनाए जाने के पीछे यही संवैधानिक प्रावधान काम कर रहे हैं। इस मामले में संविधान भले ही लचीला है, लेकिन 6 महीने की समय सीमा बेहद सख्त मानी जाती है।
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