सावन में भक्तों के साथ महाकाल भी करते हैं उपवास, जानें उज्जैन के राजा की इस अनूठी परंपरा के बारे में धर्म 3 घंटे पहले 2
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में श्रावण मास के दौरान एक विशेष परंपरा निभाई जाती है, जहां भगवान महाकाल अपने भक्तों के साथ उपवास रखते हैं और दिन भर फलाहार ग्रहण करते हैं।

सावन में महाकाल का विशेष उपवास

हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे उत्तम माना गया है। इस दौरान भक्त अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए कठोर व्रत और पूजा-पाठ करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उज्जैन के राजा भगवान महाकाल भी अपने भक्तों की तरह उपवास रखते हैं। महाकालेश्वर मंदिर में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसे भक्त काफी श्रद्धा के साथ देखते हैं। माना जाता है कि अपने भक्तों की भक्ति और उनके कष्टों को देखते हुए बाबा महाकाल भी सावन के दौरान तपस्या करते हैं।

सावन का अंतिम भौम प्रदोष व्रत

ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज के मुताबिक, इस साल सावन का अंतिम भौम प्रदोष व्रत बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 25 अगस्त 2026 को सुबह 6 बजकर 20 मिनट पर होगा और इसका समापन अगले दिन 26 अगस्त 2026 को सुबह 7 बजकर 59 मिनट पर होगा। प्रदोष व्रत का पालन करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है, इसलिए सावन के दौरान इस व्रत का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

नगर भ्रमण और महाकाल का त्याग

महाकाल मंदिर के पुजारी महेश शर्मा के अनुसार, सावन और भादो के महीने में भगवान महाकालेश्वर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। इस दौरान वे अपने भक्तों का हाल जानने के लिए प्रजा के बीच जाते हैं। पुजारी का कहना है कि श्रावण के प्रत्येक सोमवार और प्रदोष के दिन भगवान महाकाल केवल फलाहार ही ग्रहण करते हैं। वे दिन भर तपस्या में लीन रहते हैं और देर शाम जब वे नगर भ्रमण से वापस मंदिर लौटते हैं, तभी उन्हें संपूर्ण भोग अर्पित किया जाता है। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि बाबा महाकाल अपने भक्तों के दुख को अपना दुख मानते हैं और उनके साथ ही उपवास का पालन करते हैं।

कैसे निभाई जाती है महाकाल की सेवा परंपरा

उज्जैन के राजा के रूप में भगवान महाकाल की सेवा में पुजारी परिवार कई महत्वपूर्ण परंपराओं का निर्वहन करते हैं। हालांकि भगवान को प्रतिदिन भोग लगाया जाता है, लेकिन श्रावण और भादो के महीनों में यह प्रक्रिया बदल जाती है। इन दो महीनों के दौरान भगवान एक समय ही भोजन ग्रहण करते हैं। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि सुबह से लेकर शाम तक बाबा को केवल फलाहार और शकर का पानी भोग के रूप में अर्पित किया जाता है, जो उनकी त्यागी जीवनशैली को दर्शाता है।

भगवान महाकाल को प्रिय भोग

भक्त अक्सर यह जानने के उत्सुक रहते हैं कि बाबा महाकाल को सबसे ज्यादा क्या प्रिय है। पुजारी महेश शर्मा ने स्पष्ट किया कि भगवान शिव तो त्याग के प्रतीक हैं और वे अत्यंत सरल स्वभाव के हैं, इसीलिए उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है। भगवान को मेवा और भांग तो प्रिय है ही, लेकिन साथ ही बेलपत्र, धतूरा और अन्य औषधीय गुणों वाले पदार्थ भी उन्हें बहुत पसंद हैं। हालांकि सबसे जरूरी भाव है, क्योंकि महाकालेश्वर शुद्ध भाव से अर्पित की गई हर वस्तु को स्वीकार कर लेते हैं। बेलपत्र को शिव जी के जीवन का आधार माना जाता है, जिसे वे बड़ी प्रसन्नता से ग्रहण करते हैं। यही कारण है कि भक्त उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ ये चीजें अर्पित करते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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