भिंडी की खेती में भंगरी रोग का हमला, पैदावार बचाने के लिए अपनाएं ये जरूरी उपाय बिहार एक घंटा पहले 3
भिंडी की फसल को येलो वेन मोजैक वायरस यानी भंगरी रोग से भारी नुकसान हो रहा है, जिससे किसान काफी चिंतित हैं। इस बीमारी से बचाव के लिए विशेषज्ञ सफेद मक्खी के नियंत्रण और सही कीटनाशकों के प्रयोग की सलाह दे रहे हैं।

खेती में बढ़ती चुनौती

आजकल किसान पारंपरिक फसलों से हटकर फल और सब्जियों की खेती की तरफ रुख कर रहे हैं क्योंकि इसमें मुनाफा अधिक नजर आता है। हालांकि, सब्जियों की खेती के साथ कीटों और बीमारियों का खतरा भी जुड़ा होता है, जो किसानों की मेहनत पर पानी फेर सकता है। आजकल भिंडी की फसल करने वाले किसान एक गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं। इसे आम भाषा में किसान भंगरी रोग कहते हैं, जबकि वैज्ञानिक शब्दावली में इसे येलो वेन मोजैक वायरस के नाम से जाना जाता है।

क्या है भंगरी रोग के लक्षण

भिंडी की फसल में जब यह बीमारी पनपती है, तो सबसे पहले पौधे के पत्ते पीले पड़ने लगते हैं और धीरे-धीरे मुरझाने लगते हैं। इस वायरस के प्रभाव से पौधे का विकास पूरी तरह थम जाता है। सबसे बड़ी समस्या तब आती है जब भिंडी के फल विकसित होने लगते हैं। इस बीमारी के कारण फल सामान्य आकार लेने के बजाय टेढ़े-मेढ़े होने लगते हैं। व्यावसायिक स्तर पर उगाई जाने वाली भिंडी का सीधा होना जरूरी होता है, अन्यथा बाजार में इसकी सही कीमत नहीं मिलती। उत्पादन पर भी इसका बहुत बुरा असर पड़ता है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।

कैसे फैलती है यह बीमारी

पौधा संरक्षण अधिकारी सुजीत पाल ने बताया कि यह एक वायरल समस्या है, जिसे जड़ से खत्म करना चुनौतीपूर्ण होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस वायरस को एक पौधे से दूसरे पौधे तक ले जाने का मुख्य कारण सफेद कीट यानी व्हाइट फ्लाई है। यदि खेत में इन कीटों की संख्या बढ़ती है, तो पूरे खेत की फसल प्रभावित हो सकती है।

बचाव और रोकथाम के उपाय

किसानों को सलाह दी गई है कि वे फसल की शुरुआत से ही सतर्क रहें। बचाव के मुख्य तरीके निम्नलिखित हैं:

  • जैविक विकल्प: जो किसान जैविक खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं, वे नीम के तेल का छिड़काव कर सकते हैं।
  • ट्रैप का प्रयोग: खेत में पीले और नीले रंग के ट्रैप लगाना काफी प्रभावी होता है। इन ट्रैप पर एक चिपचिपा पदार्थ लगा होता है, जिससे सफेद मक्खियां और अन्य हानिकारक कीट चिपक जाते हैं। यह प्रक्रिया बीमारी के प्रसार को रोकने में बहुत मदद करती है।
  • रासायनिक नियंत्रण: जरूरत पड़ने पर किसान कीटनाशक और सकिंग पेस्ट कंट्रोल दवाओं का छिड़काव भी कर सकते हैं। सही दवाओं के चयन से इस रोग को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

सावधानी है बहुत जरूरी

विशेषज्ञों ने यह विशेष चेतावनी दी है कि किसी भी कीटनाशक दवा का छिड़काव करने के बाद किसान तुरंत भिंडी की तुड़ाई न करें। दवा का असर कुछ दिनों तक पौधों पर बना रहता है, इसलिए सुरक्षा के लिहाज से छिड़काव के बाद कम से कम एक सप्ताह का अंतराल रखना चाहिए। सात दिन बीत जाने के बाद ही सब्जी तोड़ना और उसे बाजार में बेचना सुरक्षित माना जाता है। सही समय पर प्रबंधन और सावधानी अपनाकर किसान अपनी भिंडी की फसल को इस खतरनाक वायरस से बचा सकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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