राष्ट्रीय राजनीति
4 घंटे पहले
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सुप्रीम कोर्ट में वंदे मातरम मामले पर तीखी बहस
देश की सर्वोच्च अदालत में मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को वंदे मातरम से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान माहौल उस समय पूरी तरह तनावपूर्ण हो गया जब भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर के बीच शब्दों को लेकर तीखी तकरार हुई। यह पूरी प्रक्रिया भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष संचालित की जा रही थी। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे।
क्या है पूरा विवाद और याचिका का आधार
यह मामला कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टीएम कृष्णा की उस याचिका से संबंधित है, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में 2026 में किए गए संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर, जो पूर्व में उड़ीसा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं, टीएम कृष्णा की तरफ से पैरवी कर रहे थे। उन्होंने अदालत में दलील पेश की कि सरकार द्वारा किए गए संशोधन में राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने की प्रक्रिया को दंडनीय बनाया गया है। मुरलीधर का कहना है कि सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि राष्ट्रीय गीत की परिभाषा क्या है और इसमें किन पहलुओं को शामिल किया गया है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि केवल एक ऑफिस मेमोरेंडम के आधार पर कानून में इस तरह के अर्थ नहीं जोड़े जा सकते, जिससे किसी व्यक्ति को जेल या कठोर दंड का सामना करना पड़े।
नक्सली शब्द के इस्तेमाल से बढ़ा तनाव
सुनवाई के दौरान जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपना पक्ष रखा, तो उन्होंने पीठ से आग्रह किया कि इस याचिका पर नोटिस जारी न किया जाए। उनका कहना था कि यदि नोटिस जारी किया गया, तो इससे समाज में अनावश्यक सनसनी फैल सकती है। इस पर डॉ. मुरलीधर ने अपनी बात रखते हुए कहा कि संवैधानिक निर्णय प्रक्रिया इतिहास की मोहताज नहीं होती और समय के साथ कानून और जनता की राय बदलती है। इसी दौरान बहस ने तीखा मोड़ ले लिया जब तुषार मेहता ने संसद की विधायी शक्तियों का जिक्र करते हुए कहा कि कानून का निर्माण नक्सली विचारों के अनुसार नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी पर डॉ. मुरलीधर ने कड़ा एतराज जताते हुए कहा कि देश के सॉलिसिटर जनरल को अदालत में इस तरह की शब्दावली का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उन्होंने मेहता से मांग की कि वे इस शब्द का प्रयोग करने के लिए माफी मांगें।
मैं माफी नहीं मांगूंगा: तुषार मेहता
इस मांग के जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेहद स्पष्ट लहजे में कहा कि वह किसी भी हाल में माफी नहीं मांगेंगे। उन्होंने कहा, मैं सॉरी नहीं बोलूंगा। उनके इस रुख के बाद अदालत कक्ष का माहौल और अधिक गंभीर हो गया। डॉ. मुरलीधर ने दोबारा अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि उन्होंने अपने पूरे कानूनी करियर में किसी सरकारी अधिकारी को इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हुए कभी नहीं सुना है। इस विवाद को शांत करने के लिए जस्टिस जॉयमाल्य बागची को हस्तक्षेप करना पड़ा।
अदालत का रुख और स्पष्टीकरण
मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने स्थिति को संभाला। पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत नक्सली शब्द को रिकॉर्ड पर बिल्कुल नहीं लेगी और पूरी सुनवाई को केवल कानूनी और संवैधानिक व्याख्या के दायरे तक ही सीमित रखा जाएगा। बावजूद इसके, तुषार मेहता ने अपने पक्ष को दोहराते हुए कहा कि संसद ही कानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था है और उन्होंने केवल संवैधानिक प्रक्रिया के संदर्भ में ही वह बात कही थी। उन्होंने अपना बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि वह किसी व्यक्ति विशेष को नक्सली नहीं कह रहे थे, बल्कि एक विशेष विचारधारा के प्रभाव के संदर्भ में यह बात रख रहे थे।
सुनवाई का निष्कर्ष और कानूनी प्रक्रिया
हालांकि वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मुरलीधर ने बार-बार कहा कि एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं कर सकता, लेकिन तुषार मेहता अपने रुख पर अडिग रहे। अदालत ने इस गर्मागर्म बहस के बाद मामले को आगे की प्रक्रिया के लिए व्यवस्थित किया। यह मामला अब कानून के विभिन्न पहलुओं और संशोधन की संवैधानिक बारीकियों पर केंद्रित हो गया है। 22 सितंबर 2026 की इस सुनवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वंदे मातरम के विषय पर कानून का दायरा क्या होगा और सरकार के संशोधन की वैधता पर अंतिम निर्णय क्या लिया जाएगा। फिलहाल, अदालत ने नक्सली शब्द के विवाद को पीछे छोड़ते हुए कानूनी तर्कों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश दिया है, लेकिन अदालत के गलियारों में इस तीखी बहस की चर्चा दिन भर बनी रही।
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