भागलपुर गंगा नदी में डॉल्फिन देखने के प्रमुख ठिकाने, जानें संरक्षण की नई सरकारी पहल और सही समय बिहार एक महीने पहले 48
बिहार के भागलपुर में गंगा नदी के विभिन्न घाटों पर डॉल्फिन पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं। वन विभाग अब इन्हें सुरक्षित रखने के लिए विशेष बजर तकनीक का उपयोग करने जा रहा है।

गंगा नदी की लहरों के बीच अठखेलियां करती डॉल्फिन को देखना बेहद रोमांचक अनुभव होता है। बिहार का भागलपुर जिला इस मामले में पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों के लिए बेहद खास है, जिसे डॉल्फिन का मुख्य आशियाना माना जाता है। सुल्तानगंज से लेकर बटेश्वर स्थान तक के विस्तृत गंगा क्षेत्र में इन खूबसूरत जलीय जीवों को पानी में गोते लगाते हुए आसानी से देखा जा सकता है। डॉल्फिन एक विलुप्तप्राय जलीय जीव है, जिसके संरक्षण के लिए सरकार और वन विभाग लगातार प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद भागलपुर में कई बार डॉल्फिन को इंसानी गतिविधियों के कारण नुकसान उठाना पड़ता है। गंगा में अवैध रूप से बिछाए जाने वाले जाल और अंधाधुंध चलती नावें इनके लिए सबसे बड़ा खतरा बनी हुई हैं। वन विभाग इस खतरे से निपटने के लिए समय-समय पर अवैध जालों को जब्त करने की कार्रवाई करता है, लेकिन फिर भी चोरी-छिपे ऐसी गतिविधियां चलती रहती हैं।

यहां देख सकते हैं डॉल्फिन: जानें प्रमुख घाट और सही समय

अगर आप भी गंगा की रानी डॉल्फिन को बेहद करीब से देखना चाहते हैं, तो भागलपुर के कई घाट आपके लिए बेहतरीन विकल्प साबित हो सकते हैं। स्थानीय स्तर पर कुछ ऐसे विशेष स्थान चिह्नित हैं, जहां डॉल्फिन की मौजूदगी सबसे अधिक पाई जाती है। पर्यटक और स्थानीय लोग निम्नलिखित घाटों पर जाकर इस अद्भुत नजारे का आनंद ले सकते हैं:

  • सुल्तानगंज
  • तिलकपुर
  • बूढ़ानाथ
  • आदमपुर
  • सीढ़ी घाट
  • बरारी घाट
  • बाबूपुर घाट
  • बटेश्वर घाट

इन घाटों पर डॉल्फिन को देखने का एक निश्चित समय होता है, जब वे पानी की सतह पर अधिक सक्रिय होती हैं। वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, डॉल्फिन की गतिविधियों को देखने का सबसे उत्तम समय सुबह सूर्योदय से लेकर 10 बजे तक और फिर दोपहर बाद यानी शाम को 3 बजे के बाद का होता है। इस दौरान गंगा की शांत लहरों के बीच डॉल्फिन को उछलकूद करते देखना लोगों को काफी रोमांचित करता है।

संरक्षण के लिए नई तकनीक: नावों में लगेगा 'बजर' यंत्र

डॉल्फिन की सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए वन विभाग अब एक बेहद अनूठी और नई योजना पर काम कर रहा है। भागलपुर के वन पदाधिकारी ने इस संबंध में बताया कि डॉल्फिन के संरक्षण के लिए एक ऐसे विशेष कार्य का प्रस्ताव तैयार किया गया है, जो इस क्षेत्र में पहली बार लागू होगा। इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए उच्च स्तर पर विभाग के पास भेज दिया गया है।

इस नई योजना के तहत, गंगा नदी में चलने वाली नावों में बजर नामक एक विशेष इलेक्ट्रॉनिक यंत्र लगाया जाएगा। यह यंत्र एक सेंसर की तरह काम करेगा। जैसे ही कोई नाव पानी में डॉल्फिन के करीब पहुंचेगी, यह यंत्र अपने सेंसर के जरिए डॉल्फिन की मौजूदगी को भांप लेगा और तेज आवाज करने लगेगा। इस आवाज को सुनकर नाविक तुरंत सचेत हो जाएगा कि पास में ही डॉल्फिन मौजूद है। ऐसी स्थिति में नाविक या तो अपनी नाव की दिशा बदल लेगा या फिर वहां से नाव की गति को धीमा करके सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ेगा। इस तकनीक के इस्तेमाल से अनजाने में डॉल्फिन को होने वाली दुर्घटनाओं और चोटों से पूरी तरह बचाया जा सकेगा और वे सुरक्षित रहेंगी।

भागलपुर में बढ़ी डॉल्फिन की आबादी, आंकड़े कर रहे उत्साहित

भागलपुर गंगा नदी का क्षेत्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा गंगा अभ्यारण्य क्षेत्र है। इस वजह से यहां जलीय जीवों का संरक्षण और उनकी सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में किए गए संरक्षण प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, जिससे डॉल्फिन की संख्या में संतोषजनक बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

वर्ष 2022 की गणना के आंकड़ों के अनुसार, भागलपुर के इस गंगा क्षेत्र में डॉल्फिन और उनके बच्चों की कुल संख्या लगभग 210 दर्ज की गई थी। इससे पहले, वर्ष 2018 में यह संख्या करीब 178 के आसपास थी। चार वर्षों के अंतराल में संख्या का 178 से बढ़कर 210 होना यह दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर चलाए जा रहे संरक्षण कार्यक्रम सही दिशा में काम कर रहे हैं।

वन विभाग ने आम जनता और स्थानीय नाविकों से भी अपील की है कि वे इन जलीय जीवों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील रहें। यदि किसी भी नागरिक को गंगा नदी में कोई डॉल्फिन या अन्य जलीय जीव घायल अवस्था में दिखाई देता है, तो उसकी सूचना तुरंत वन विभाग को दी जानी चाहिए। त्वरित सूचना मिलने से घायल जीव का समय पर इलाज संभव हो सकेगा, जिससे उसकी जान बचाई जा सकती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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