बिहार
एक महीने पहले
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विचारों
बिहार के भागलपुर में चिकित्सा विज्ञान का एक ऐसा अद्भुत और अनोखा चमत्कार सामने आया है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। इसे ईश्वर की असीम अनुकंपा कहें या फिर डॉक्टरों की असाधारण मेहनत, लेकिन "जाको राखे साइयां मार सके न कोई" वाली सदियों पुरानी कहावत यहाँ बिल्कुल सटीक साबित हुई है। भागलपुर के एक निजी अस्पताल में डॉक्टरों की एक कुशल टीम ने बेहद नाजुक स्थिति में जन्मी एक नवजात बच्ची को नया जीवन देने में सफलता प्राप्त की है। इस बच्ची का जन्म समय से काफी पहले यानी गर्भधारण के महज 26वें सप्ताह में ही हो गया था। जन्म के समय उस मासूम का वजन सिर्फ 540 ग्राम था। चिकित्सा क्षेत्र में इस तरह के मामलों को बेहद गंभीर माना जाता है, जहाँ बचने की उम्मीद ना के बराबर होती है।
सोलह वर्षों का लंबा इंतजार और माता-पिता बनने की खुशी
यह पूरा मामला भागलपुर के पीरपैंती इलाके के रहने वाले एक दंपत्ति से जुड़ा हुआ है। संजय ठाकुर और उनकी पत्नी सुनीता देवी पिछले कई सालों से संतान सुख के लिए तरस रहे थे। साल 2007 में विवाह बंधन में बंधने के बाद से ही इस दंपत्ति के घर-आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजने की आस थी। उन्होंने इस लंबे अंतराल में कई जगहों पर डॉक्टरों से संपर्क किया और काफी इलाज भी करवाया। इस दौरान उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए IVF तकनीक का भी सहारा लिया। लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया और दो बार IVF का प्रयास पूरी तरह से असफल साबित हुआ। लगातार मिल रही असफलताओं के बाद भी इस दंपत्ति ने अपनी हिम्मत नहीं खोई। इसके बाद उन्होंने भागलपुर में ही एक बार फिर से IVF तकनीक के जरिए प्रयास किया, जो इस बार सफल रहा।
24वें सप्ताह में अचानक बढ़ी परेशानी
गर्भावस्था के दौरान सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन अचानक 24वें सप्ताह में सुनीता देवी को गंभीर शारीरिक परेशानी होने लगी और उनका वाटर डिस्चार्ज शुरू हो गया। ऐसी नाजुक परिस्थिति में उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों के सामने माँ और होने वाले बच्चे दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक अत्यंत कठिन चुनौती थी। काफी सोच-विचार करने के बाद डॉक्टरों की टीम ने सुरक्षित प्रसव कराने का अहम फैसला लिया। आखिरकार गर्भावस्था के 26वें सप्ताह में डिलीवरी कराई गई, जिसके बाद इस बेहद कमजोर और कम वजन वाली बच्ची का जन्म हुआ।
भारत में ऐसे मामलों में बचने की उम्मीद सिर्फ 1 प्रतिशत
मेडी फोर्ट अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर अशोक ने इस पूरे मामले की संवेदनशीलता के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि जब बच्ची का जन्म हुआ, तो उसका वजन मात्र 540 ग्राम था। डॉक्टर अशोक ने कहा कि उनके पूरे चिकित्सा करियर में यह पहला ऐसा मामला है, जिसमें इतने कम वजन वाले बच्चे को जीवित बचाने में सफलता मिली है। उनके मुताबिक, भारत जैसे देश में इस तरह के अत्यधिक समय से पहले जन्मे बच्चों के जीवित बचने की संभावना केवल 1 प्रतिशत ही होती है।
डॉक्टरों की पूरी टीम ने इस बच्ची की जान बचाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। चिकित्सा विभाग की आधुनिक तकनीक और डॉक्टरों की निरंतर निगरानी का ही परिणाम है कि आज यह बच्ची पूरी तरह से स्वस्थ और सुरक्षित है। डॉक्टर अशोक ने बताया कि निरंतर इलाज और देखभाल के बाद अब बच्ची का वजन बढ़कर करीब 1600 ग्राम हो चुका है।
अब भागलपुर में ही संभव हुआ इलाज
इस चमत्कारी सफलता की सबसे बड़ी और खास बात यह है कि बच्ची के शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंग बिल्कुल सुरक्षित और सामान्य रूप से काम कर रहे हैं। डॉक्टरों ने बच्ची की आंखों, नाक, कान, हृदय और फेफड़ों की गहन जांच की है, और उसके सभी अंग पूरी तरह से सही पाए गए हैं। डॉक्टर अशोक ने बताया कि पूर्व में इस प्रकार के बेहद जटिल और नाजुक मामलों के इलाज के लिए मरीजों को मुंबई जैसे बड़े महानगरों की ओर जाना पड़ता था। लेकिन अब चिकित्सा क्षेत्र में हुई प्रगति के कारण भागलपुर जैसे शहरों में भी इस स्तर का उन्नत और सफल इलाज संभव हो गया है। डॉक्टर ने बच्ची के उज्जवल और स्वस्थ भविष्य की कामना भी की है।
परिजनों के चेहरे पर लौटी मुस्कान
इस चमत्कारी घटना के बाद से ही ठाकुर परिवार में उत्सव का माहौल है। बच्ची के पिता संजय ठाकुर ने डॉक्टरों की टीम के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि शादी के 16 साल बीत जाने और दो बार IVF फेल होने के बाद जब बच्ची का जन्म हुआ, तो उन्हें बिल्कुल भी यकीन नहीं था कि वह बच पाएगी। लेकिन डॉक्टरों की लगन ने उनकी बच्ची को एक नया जीवन दिया है। वहीं, बच्ची की माँ सुनीता देवी भी अपनी खुशी नहीं छुपा पा रही हैं। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि जिस संतान का इंतजार वह साल 2007 से कर रही थीं, आज उसे अपनी बाहों में देखकर उनकी जिंदगी पूरी हो गई है। इतने कम दिनों की बच्ची को सुरक्षित बचाए जाने पर पूरा परिवार खुद को बेहद भाग्यशाली मान रहा है।
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