भागलपुर का ऐतिहासिक बूढ़ानाथ मंदिर: रामायण काल से जुड़ी हैं इस पावन धाम की प्राचीन कथाएं बिहार 2 घंटे पहले 3
गंगा के तट पर बसा भागलपुर का बूढ़ानाथ मंदिर अपनी आध्यात्मिक भव्यता और रामायण काल से जुड़े गहरे संबंधों के लिए प्रसिद्ध है। सावन के पवित्र महीने में इस मंदिर में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है और भक्त बाबा बाल वृद्धेश्वर नाथ का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं।

गंगा किनारे स्थित आस्था का केंद्र

बिहार के भागलपुर शहर में गंगा नदी के तट पर स्थित बाबा बाल वृद्धेश्वर नाथ का मंदिर, जिसे आमतौर पर बूढ़ानाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है, अपनी प्राचीन मान्यताओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के कारण भागलपुर में कई ऐसी धरोहरें मौजूद हैं, जिनके बारे में जानकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। हालांकि श्रावणी मेले के दौरान बाबा अजगैबीनाथ धाम की चर्चा सबसे अधिक होती है, लेकिन शहर के बीचों-बीच स्थित यह बूढ़ानाथ मंदिर भी आस्था और श्रद्धा का एक बड़ा केंद्र है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में स्थानीय प्रबुद्ध जन और श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव को जलार्पण करते हैं।

रामायण काल से गहरा संबंध

भागलपुर, जो प्राचीन काल में अंग क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा हुआ करता था, का इतिहास रामायण और महाभारत काल से गहराई से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अंग देश पर कभी राजा कर्ण का शासन था, लेकिन रामायण काल से जुड़े कई प्रमाण इस मंदिर की महिमा को और अधिक बढ़ा देते हैं। मंदिर के प्रबंधक और देखभाल करने वाले वशिष्ठ जी के अनुसार, यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। लोक मान्यता है कि स्वयं भगवान राम के गुरु वशिष्ठ ने ही इस शिवलिंग की स्थापना की थी। मंदिर का नाम बाल वृद्धेश्वर पड़ने के पीछे भी एक रोचक कथा है, जो भगवान के बाल स्वरूप से संबंधित है।

नगर के रक्षक के रूप में मान्यता

श्रद्धालुओं के बीच ऐसी मान्यता है कि बाबा बूढ़ानाथ पूरे भागलपुर नगर की रक्षा करते हैं। यही कारण है कि इसे शहर की हृदयस्थली भी कहा जाता है। गंगा के तट पर स्थित होने के कारण यहां की छटा देखते ही बनती है और सावन के महीने में जब चारों ओर भक्ति का माहौल होता है, तो यहां भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। भक्त दूर-दूर से अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और बाबा भोलेनाथ की आराधना करते हैं।

बटेश्वर स्थान से जुड़ा है पौराणिक इतिहास

इस मंदिर की महत्ता केवल बूढ़ानाथ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध बटेश्वर स्थान से भी है। मंदिर प्रबंधन के अनुसार, बूढ़ानाथ और बटेश्वर स्थान, दोनों ही मंदिरों की स्थापना भगवान राम के गुरु के द्वारा की गई थी। पुराने समय में यह मंदिर क्षेत्र काफी विशाल विस्तार में फैला हुआ था। आज भी उन पहाड़ियों पर वह स्थान मौजूद है, जहां ऋषियों ने कठोर तपस्या की थी। भक्तों का अटूट विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से यहां आकर भगवान भोले की पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। सावन के पवित्र दिनों में यहां की ऊर्जा और दिव्यता देखते ही बनती है, जो हर आने वाले भक्त को एक अलौकिक शांति का अनुभव कराती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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