बिहार
एक घंटा पहले
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बांकीपुर में प्रशांत किशोर का बड़ा धमाका
बिहार की राजनीति में बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे किसी बड़े भूचाल से कम नहीं हैं। प्रशांत किशोर ने इस प्रतिष्ठित सीट पर 19324 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज कर ली है। यह जीत इसलिए भी बेहद खास मानी जा रही है क्योंकि प्रशांत किशोर ने मात्र 35-40 दिनों की कड़ी मेहनत के बल पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उस किले को ढहा दिया, जिसे दशकों से सुरक्षित माना जाता था। प्रशांत किशोर की इस सफलता ने इस छोटे से उपचुनाव को राज्य स्तरीय विमर्श का केंद्र बना दिया है। यही कारण है कि अब हर तरफ 1994 के वैशाली लोकसभा उपचुनाव के साथ इसकी तुलना की जा रही है। आइए, उस पुराने राजनीतिक घटनाक्रम को समझते हैं और देखते हैं कि क्यों बांकीपुर का आज का नतीजा उस दौर की याद दिला रहा है।
क्यों खास रही बांकीपुर की लड़ाई?
शुरुआत में बहुत से लोगों को यह लग रहा था कि महज एक विधानसभा सीट के उपचुनाव पर इतनी गहमागहमी क्यों है। इसके पीछे तीन मुख्य कारण थे। पहली वजह यह थी कि यह सीट नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई थी, जो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद भी हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के करीबी नेताओं की सीट के रूप में देखा जाता था। दूसरी वजह यह थी कि पिछले 31 वर्षों से इस सीट पर नवीन किशोर प्रसाद और उनके बेटे नितिन नवीन का एकछत्र राज था। इसे पूरे बिहार में बीजेपी की सबसे सुरक्षित सीटों में गिना जाता था। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण वजह यह थी कि राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर स्वयं पहली बार किसी चुनाव में उम्मीदवार थे। बीजेपी ने अपने बड़े नेताओं की साख बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन आखिरकार प्रशांत किशोर ने 19 हजार से अधिक मतों से जीत हासिल कर सबको हैरान कर दिया।
1994 का वह दौर और लालू यादव की राजनीति
साल 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से लालू प्रसाद यादव की राजनीति का अंदाज बिल्कुल अलग था। उस समय के पूरे बिहार, जिसमें आज का झारखंड भी शामिल था, लालू यादव की लोकप्रियता चरम पर थी। ओबीसी और दलितों के समर्थन के दम पर वे सवर्णों के प्रति तीखे बयान देने से भी गुरेज नहीं करते थे। उस समय लालू कैबिनेट में सड़क मंत्री इलियास हुसैन के प्रयासों से डेहरी ऑन सोन में एक ब्लॉक का निर्माण हुआ था। उसके उद्घाटन समारोह में लालू प्रसाद यादव ने मंच से सवर्णों, विशेषकर जनेऊधारियों को लेकर बेहद विवादास्पद टिप्पणी की थी। उन्होंने खुलेआम कहा था कि वे पिछड़ों को सम्मान दिलाने के लिए जनेऊधारियों को सबक सिखाएंगे। उनके 'भूरा बाल साफ करो' जैसे नारे और मंडल आयोग के बाद उपजा जातीय तनाव समाज को बांट रहा था। उस दौर में अगड़े-पिछड़े का संघर्ष अपनी पराकाष्ठा पर था, जिससे ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत समाज में गहरी नाराजगी व्याप्त थी। इसी बीच, आनंद मोहन जैसे नेताओं का उदय सवर्णों के बीच एक आशा की किरण के रूप में हुआ था, जो लालू यादव की राजनीति के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे थे।
वैशाली उपचुनाव की ऐतिहासिक पटकथा
जनता दल के सांसद शिवशरण सिंह के आकस्मिक निधन के बाद 1994 में वैशाली लोकसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई। उस समय तक आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी (BPP) का गठन कर लिया था। जब वैशाली में उपचुनाव का बिगुल बजा, तो आनंद मोहन ने लालू प्रसाद यादव को मात देने के लिए अपनी पत्नी लवली आनंद को चुनाव मैदान में उतारा। उनके सामने कांग्रेस पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा को टिकट दिया, जिन्हें सीधे तौर पर लालू यादव का समर्थन हासिल था। यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं, बल्कि लालू यादव के वर्चस्व को खत्म करने की एक बड़ी लड़ाई बन गया था। पूरे प्रचार के दौरान आनंद मोहन और लवली आनंद ने सवर्णों को एकजुट होने का आह्वान किया। मतगणना के दौरान मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज में घंटों तक सस्पेंस बना रहा। शाम करीब साढ़े पांच बजे लवली आनंद की जीत की घोषणा हुई।
जीत के बाद का वह मंजर
जीत की घोषणा के बाद आनंद मोहन अपने समर्थकों के साथ विजय जुलूस में निकले। उन्होंने और लवली आनंद ने काले रंग के चश्मे पहने थे और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए वे काउंटिंग सेंटर पहुंचे। उनके समर्थक 'आनंद मोहन जिंदाबाद' और 'लवली आनंद जिंदाबाद' के नारों से पूरे इलाके को गुंजायमान कर रहे थे। उस समय आनंद मोहन ने पत्रकारों से बात करते हुए पूरे आत्मविश्वास के साथ दावा किया था कि अगले 6 महीने में वे बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे। उस जीत ने बिहार के सवर्णों में एक नई उम्मीद जगाई थी। हालांकि, बाद के वर्षों में छोटन शुक्ला की हत्या और जी. कृष्णैया हत्याकांड जैसे मामलों ने आनंद मोहन की राजनीतिक यात्रा को कठिन बना दिया।
बांकीपुर और वैशाली की तुलना क्यों?
आज प्रशांत किशोर की जीत की तुलना उसी 1994 के घटनाक्रम से इसलिए की जा रही है क्योंकि प्रशांत किशोर भी लगातार यह दोहराते रहे कि वे केवल विधायक बनने के लिए नहीं, बल्कि बिहार की व्यवस्था बदलने के लिए लड़ रहे हैं। उन्होंने बांकीपुर में पारंपरिक जातीय समीकरणों को दरकिनार कर अपनी जीत सुनिश्चित की है। उन्होंने सीधे तौर पर बीजेपी के अहंकार को चुनौती दी है। प्रशांत किशोर का यह भी मानना है कि उनकी जीत सरकार की स्थिरता के लिए खतरा नहीं है, लेकिन यह एक तरह का जनमत संग्रह जरूर है कि बिहार की जनता सम्राट चौधरी जैसे नेताओं के नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर रही है। प्रशांत किशोर ने जीत के बाद सम्राट चौधरी को पद से हटाने की मांग भी उठा दी है। आज का बिहार भी उसी तरह की सामाजिक असंतोष की स्थिति से गुजर रहा है, जैसा 1994 के समय देखा गया था। यूजीसी कानून, आरक्षण संबंधी विवाद और युवाओं के बढ़ते गुस्से ने वर्तमान सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। भाजपा पर आरोप है कि वह सवर्णों की नाराजगी को नजरअंदाज कर रही है, जिसका खामियाजा उन्हें बांकीपुर में प्रशांत किशोर के रूप में मिली इस बड़ी चुनौती से उठाना पड़ा है।
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