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एक घंटा पहले
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हाईकोर्ट से मिली राहत
बांग्लादेश की अदालत ने हिंदू संत चिन्मय कृष्णदास को बड़ी राहत देते हुए उन्हें दो और मुकदमों में जमानत दे दी है। रविवार को मिली इस कानूनी कामयाबी के बाद चिन्मय कृष्णदास को अब तक कुल 4 मामलों में जमानत हासिल हो चुकी है। हालांकि, इस राहत के बावजूद वह अभी जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे, क्योंकि उनके खिलाफ अभी भी 2 अन्य मुकदमे लंबित हैं, जिनमें जमानत मिलना शेष है।
दो सदस्यीय बेंच का फैसला
चिन्मय कृष्णदास की ओर से पैरवी कर रहे वकील अपूर्ब कुमार भट्टाचार्य ने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने रविवार को सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। इस पीठ में जस्टिस जाहिद सरवर और जस्टिस शेख अबू ताहेर शामिल थे। वकील ने स्पष्ट किया कि जिन मुकदमों में जमानत मिली है, उनमें सरकारी कामकाज में बाधा डालने, तोड़फोड़ और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। गौरतलब है कि इससे पहले 2 अगस्त को भी उन्हें 2 अलग-अलग मामलों में जमानत दी गई थी। इस तरह अब कुल 4 मामलों में उन्हें कानूनी राहत मिल चुकी है।
अभी भी बाकी है कानूनी लड़ाई
जमानत के इस सिलसिले के बाद भी चिन्मय कृष्णदास की मुश्किलें पूरी तरह से खत्म नहीं हुई हैं। उनके विरुद्ध वर्तमान में 2 ऐसे मामले हैं जो अभी भी लंबित हैं। इनमें से एक मामला देशद्रोह से जुड़ा हुआ है, जबकि दूसरा मामला चटगांव में हत्या के आरोप से संबंधित है। कानूनी विशेषज्ञों और उनके वकीलों का कहना है कि जब तक इन दोनों लंबित मामलों में अदालत से जमानत नहीं मिल जाती, तब तक उन्हें जेल से रिहाई नहीं मिल पाएगी।
गिरफ्तारी और घटनाक्रम
चिन्मय कृष्णदास की गिरफ्तारी 25 नवंबर 2024 को ढाका हवाई अड्डे से हुई थी। वह पहले इस्कॉन के प्रवक्ता के तौर पर अपनी पहचान बना चुके थे और बाद में बांग्लादेश सम्मिलित सनातनी जागरण जोत के बैनर तले सक्रिय थे। उन पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप लगाया गया था। उनकी गिरफ्तारी के बाद देशभर में विरोध की लहर दौड़ गई थी। 27 नवंबर 2024 को चटगांव अदालत परिसर में उनके समर्थकों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें एक वकील की जान भी चली गई थी।
अल्पसंख्यकों की आवाज
चिन्मय कृष्णदास बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए एक प्रमुख चेहरा रहे हैं। उन्होंने अल्पसंख्यक संरक्षण कानून की मांग रखने के साथ ही अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष ट्रिब्यूनल और एक अलग मंत्रालय बनाने की वकालत की है। अगस्त के महीने में उनकी कानूनी टीम ने उनकी रिहाई में देरी पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का आरोप लगाया था। अब जब 4 मुकदमों में जमानत मिल गई है, तो सभी की निगाहें शेष 2 मामलों की सुनवाई पर टिकी हुई हैं।
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