पैदल चल-चलकर जनता का दिल जीतने वाले बाबू मैनेजर सिंह, शिक्षा की अलख जगाकर बने द्वाबा के 'दूसरे मालवीय' उत्तर प्रदेश एक महीने पहले 20
बलिया के बैरिया क्षेत्र के द्वाबा में आजादी के बाद शिक्षा का भारी अभाव था, जिसे दूर करने में बाबू मैनेजर सिंह की अहम भूमिका रही। पांच बार विधायक रहे इस सादगीपूर्ण नेता को आज भी पूरा जनपद सम्मान के साथ याद करता है।

भारत में कुछ ऐसी हस्तियां हुई हैं जिन्होंने अपने काम के दम पर इतिहास के पन्नों में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लिया। ऐसी ही एक शख्सियत हैं बाबू मैनेजर सिंह, जिन्हें द्वाबा का 'दूसरा मालवीय' कहा जाता है। मदन मोहन मालवीय जी को जहां पूरा देश शिक्षा के प्रसार के लिए जानता है, वहीं बलिया जनपद के द्वाबा क्षेत्र में एक और ऐसे व्यक्ति ने जन्म लिया, जिन्होंने बेहद साधारण और सादगीभरा जीवन जीते हुए शिक्षा की अलख जगाई।

बात बलिया जनपद के बैरिया क्षेत्र के द्वाबा की है, जहां आजादी के बाद शिक्षा का बहुत अभाव था। इस कमी को दूर करने में बाबू मैनेजर सिंह का योगदान बेहद अहम माना जाता है। आज भी पूरा जनपद उन्हें बड़े सम्मान के साथ याद करता है और वे आज के जनप्रतिनिधियों के लिए एक मिसाल बने हुए हैं।

साधारण किसान परिवार में जन्म

प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय बताते हैं कि बाबू मैनेजर सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के करमानपुर गांव में हुआ था, जो बैरिया तहसील के द्वाबा क्षेत्र में स्थित है। उनका जन्म 20 जनवरी 1920 को एक साधारण किसान परिवार में हुआ। वे पहली बार 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए थे।

पैदल घूमकर किया प्रचार

आज की पीढ़ी के लिए उनकी कहानी जानना इसलिए जरूरी है, क्योंकि उस दौर में उनके पास कोई साधन नहीं था। वे पैदल घूम-घूमकर प्रचार-प्रसार करते थे और जनता भी पूरे मन से उनका साथ देती थी। यही वजह रही कि वे द्वाबा से पांच बार विधायक चुने गए, और आज उन्हें द्वाबा का मालवीय कहा जाता है।

शिक्षा की नींव रखने वाला नेतृत्व

जिस समय देश आजाद हुआ, उस समय सबसे बड़ा संकट शिक्षा का था। आज जो सुदिष्ट पूरी इंटर कॉलेज और सुदिष्ट पूरी डिग्री कॉलेज दिखाई देते हैं, वे बाबू मैनेजर सिंह की ही देन हैं। इनके अलावा द्वाबा क्षेत्र में ऐसे कई स्कूल हैं, जिनकी स्थापना उन्होंने करवाई। उन्होंने द्वाबा को शिक्षा से जोड़ने का काम किया। आज इस क्षेत्र में जो शिक्षा का स्तर दिखाई देता है, उसमें उनका बहुत बड़ा योगदान है, इसीलिए उन्हें द्वाबा का मालवीय बाबू मैनेजर सिंह कहा जाता है।

सादगी ही थी पहचान

पांच बार विधायक रहने के बावजूद वे बेहद साधारण ढंग से जीवन जीते थे। आज जहां कोई व्यक्ति प्रधान बन जाने पर महंगी-महंगी गाड़ियों में चलता है, वहीं बाबू मैनेजर सिंह अक्सर किसी छोटी-मोटी चाय की दुकान पर या किसान के खेत में नजर आ जाया करते थे। सादगी ही उनके जीवन की असली पहचान थी।

ट्रेन और बस से करते थे सफर

मैनेजर सिंह बहुत ही कम मौकों पर कार से बलिया आए होंगे। वे अधिकतर ट्रेन और बस जैसे सार्वजनिक साधनों से ही बलिया आते-जाते थे। आज जब पेट्रोलियम की किल्लत है और प्रधानमंत्री को अपने प्रतिनिधियों से गाड़ियों का कम इस्तेमाल करने की अपील करनी पड़ रही है, ऐसे में उनका जीवन और भी प्रासंगिक लगता है। बाबू मैनेजर सिंह पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के भी बेहद करीबी सहयोगी रहे। ऐसे प्रेरणादायक जनप्रतिनिधियों से आज के लोगों को सीख लेने की जरूरत है।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप