मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
बालाघाट जिले के लोग लंबे समय से बालाघाट-गर्रा रेलवे ओवरब्रिज के खुलने का इंतजार कर रहे थे। लेकिन जब आखिरकार यह ब्रिज जनता के लिए खुला, तो उसे देखकर लोग हैरान रह गए। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार हुए इस पुल का उद्घाटन होते ही उसकी निर्माण गुणवत्ता पर ही सवाल खड़े हो गए।
मध्य प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से रेलवे ओवरब्रिज लगातार सुर्खियों में रहे हैं। पहले भोपाल का 90 डिग्री वाला ओवरब्रिज चर्चा में रहा, फिर इंदौर का Z आकार का रेल ओवरब्रिज और अब बालाघाट का यह रेल ओवरब्रिज उद्घाटन के साथ ही चर्चा का केंद्र बन गया है। दरअसल जिस बालाघाट-गर्रा रेलवे ओवरब्रिज का लोकार्पण हुआ, उसके एक बड़े हिस्से में फुटपाथ ही नहीं बनाया गया है। ऊपर से जब इस बारे में एसडीओ से सवाल किया गया तो उनका जवाब और भी हैरान करने वाला था। ब्रिज को देखने पर ऐसा लगता है मानो क्रिकेट बैट हो और उसके आगे का हिस्सा उसका हैंडल हो।
उद्घाटन में क्षेत्रीय विधायक रहीं नदारद
बालाघाट-गर्रा रेलवे ओवरब्रिज के उद्घाटन के मौके पर जिला प्रभारी मंत्री उदय राव प्रताप सिंह, सांसद भारती पारधी और स्थानीय जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। हालांकि यह आयोजन क्षेत्रीय विधायक अनुभा मुंजारे की गैरमौजूदगी में हुआ। इस पर विधायक ने प्रोटोकॉल के उल्लंघन और प्रशासन द्वारा अनदेखी किए जाने का आरोप लगाया है।
यह ब्रिज लगभग 746 मीटर लंबा है, जिसके एक बड़े हिस्से में फुटपाथ का निर्माण ही नहीं किया गया। यह सिर्फ एक बड़ी चूक नहीं है, बल्कि पैदल चलने वाले लोगों के लिए असुरक्षा का कारण भी बन रहा है।
गुणवत्ता पर खड़े हुए सवाल
रेलवे फाटक पर लगने वाले जाम और यातायात की समस्या को खत्म करने के मकसद से बनाए गए इस आरओबी को आधुनिक तकनीक और पाइल फाउंडेशन पर तैयार किया गया है। लोकार्पण के दौरान इसे विकास का प्रतीक बताया गया, मगर निर्माण पूरा होने के बाद अब इसकी गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुल के कुछ हिस्सों में निर्माण कार्य तय मानकों के अनुरूप नजर नहीं आता। वहीं पैदल चलने वालों के लिए जरूरी सुविधाएं भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं कराई गई हैं।
रोजाना गुजरेंगे हजारों लोग
रेलवे फाटक की समस्या खत्म होने से हजारों यात्रियों को राहत जरूर मिलेगी, लेकिन पैदल चलने वालों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। ब्रिज के बड़े हिस्से पर फुटपाथ है ही नहीं। यहां से हर दिन स्कूली बच्चे, बुजुर्ग और दूसरे राहगीर वाहनों से और पैदल आते-जाते हैं। ऐसे में अब पैदल चलने वाले लोगों को मजबूरी में सड़क पर ही चलना पड़ेगा।
सावन में बढ़ेगी सबसे बड़ी परेशानी
गौरतलब है कि पुल के पास ही शंकर घाट पर शिव मंदिर स्थित है, जहां श्रावण मास और महाशिवरात्रि के मौके पर हजारों श्रद्धालु पैदल पहुंचते हैं। ऐसे में उन्हें फुटपाथ के अभाव में जान जोखिम में डालकर गुजरना पड़ेगा। लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च कर पुल तो बना दिया गया, लेकिन पैदल यात्रियों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर दिया गया।
एसडीओ का चौंकाने वाला बयान
इस मामले में जब सेतु विभाग के एसडीओ अर्जुन सनोडिया से बात की गई तो उन्होंने कहा कि ब्रिज को जल्दी बनाने का दबाव था और आम जनता को ट्रैफिक से राहत देनी थी। उन्होंने बताया कि वन विभाग से एनओसी नहीं मिल पाई, इसलिए ब्रिज को जल्द तैयार करने के लिए उतने हिस्से में फुटपाथ नहीं बनाया जा सका।
एसडीओ ने यह भी स्वीकार किया कि डीपीआर में पूरा फुटपाथ बनाने का प्रावधान था। लेकिन उनका तर्क था कि अगर एनओसी का इंतजार करते रहते तो ब्रिज बनने में 25 साल तक लग जाते।
डीपीआर में स्ट्रीट लाइट ही नहीं, फिर लगाया जुगाड़
सूत्रों के अनुसार, बालाघाट-गर्रा आरओबी की बुनियादी डीपीआर में स्ट्रीट लाइट का प्रावधान ही नहीं था। निर्माण कार्य चलता रहा, मगर किसी जिम्मेदार अधिकारी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि यहां स्ट्रीट लाइट लगवाई जानी है। जब काम पूरा होने को आया और उद्घाटन की तारीख नजदीक आई, तब जाकर अधिकारियों को इसका ख्याल आया।
इसके बाद इस काम को डीपीआर में शामिल किया गया और अब इसके लिए टेंडर निकाले गए हैं। फिलहाल रात में हादसा न हो, इसके लिए सेतु विभाग ने जुगाड़ कर हैलोजन लाइटें लगा दी हैं। इस पर प्रभारी मंत्री ने कहा, ”तब आप लोग ही कहते कि लाइट नहीं लगी। सिर्फ लाइट के चक्कर में उद्घाटन नहीं हुआ। सब लग जाएगा।” इतना कहकर मंत्री जी फुटपाथ से जुड़े सवाल का जवाब दिए बिना ही वहां से चले गए।
नाम को लेकर भी छिड़ी बहस
अब नगर पालिका बालाघाट ने इस ब्रिज का नामकरण करते हुए 'राजा भोज रेलवे ओवर ब्रिज' नाम का बोर्ड लगा दिया है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर बड़ी बहस छिड़ गई है। आम लोगों की मांग है कि इस ब्रिज का नाम वैनगंगा रेलवे ओवरब्रिज रखा जाए, या फिर शंकर घाट के नजदीक होने के कारण भगवान शंकर से जुड़ा कोई नाम दिया जाए। कुछ लोग चाहते हैं कि इसका नाम बालाघाट जिले के दानवीर मुलना या नक्सल ऑपरेशन के दौरान शहीद हुए इंस्पेक्टर आशीष शर्मा के नाम पर रखा जाए।
लोगों का तर्क है कि यह पुल आम जनता के टैक्स के पैसों से बना है, इसलिए इसका नाम देश और आम जनता से जुड़े किसी व्यक्ति के नाम पर रखा जाना चाहिए।
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