उत्तराखंड
एक घंटा पहले
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विचारों
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में उगने वाला पाती का पौधा महज एक साधारण वनस्पति भर नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र की सदियों पुरानी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। पहाड़ी जीवन में इसकी अपनी एक खास पहचान और महत्व रहा है।
पूजा-परंपरा का अहम हिस्सा
ग्रामीण इलाकों में पीढ़ियों से यह रिवाज चला आ रहा है कि सुबह और शाम भगवान की आरती के समय बाजार में मिलने वाली रासायनिक धूपबत्ती के बजाय पाती की पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। इन पत्तियों को सुलगते हुए कोयले पर रखकर जलाया जाता है, जिससे घर में प्राकृतिक धूप की महक फैलती है। यह परंपरा आज भी जीवित है।
घंटों बनी रहती है महक
स्थानीय जानकार विमला दानू बताती हैं कि पाती की खुशबू पूरी तरह शुद्ध और रसायनों से मुक्त होती है। उनके अनुसार, एक बार जलाने के बाद इसकी महक घर में 8 से 12 घंटे तक कायम रहती है।
प्राकृतिक एयर फ्रेशनर का काम
विमला दानू के मुताबिक, यह सुगंध केवल घर के वातावरण को शुद्ध ही नहीं करती, बल्कि मन को सुकून भी पहुंचाती है। यही वजह है कि यह एक बेहतरीन प्राकृतिक एयर फ्रेशनर के रूप में भी काम करती है, जो बाजार में मिलने वाले रासायनिक उत्पादों का स्वस्थ विकल्प साबित होती है।
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