आयतुल्ला अली खामेनेई की सुपुर्द-ए-खाक की रस्में शुरू, जानें इस्लामी परंपरा में क्या है अंतिम सफर का महत्व विश्व एक महीने पहले 67
ईरान के मरहूम रहबर-ए-आला आयतुल्ला अली खामेनेई को अंतिम विदाई देने की प्रक्रिया आज से शुरू हो गई है, जिसमें तेहरान से मशहद तक कई दिनों के कार्यक्रम तय किए गए हैं। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि इस्लाम धर्म में अंतिम संस्कार की रस्में किस तरह पूरी की जाती हैं।

तेहरान से मशहद तक अंतिम विदाई का सफर

ईरान के रहबर-ए-आला और बेहद प्रभावशाली शख्सियत रहे मरहूम आयतुल्ला अली खामेनेई की सुपुर्द-ए-खाक की रस्में आज से आधिकारिक रूप से प्रारंभ हो रही हैं। इस दौरान तेहरान से लेकर मशहद तक विभिन्न धार्मिक और राजकीय कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। ईरानी प्रशासन ने अगले कुछ दिनों तक चलने वाले अंतिम संस्कार के विस्तृत कार्यक्रम की घोषणा कर दी है।

सबसे पहले तेहरान में जनाजे की नमाज और आम जनता के लिए आखिरी दीदार की रस्में अदा की जाएंगी। इसके बाद कुम शहर में धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाएगा और अंततः 9 जुलाई को मशहद में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। आयतुल्ला खामेनेई का निधन केवल ईरान ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मुस्लिम जगत के लिए एक बड़ा ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। इस मौके पर कई लोगों के मन में यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक है कि आखिर 'सुपुर्द-ए-खाक' की प्रक्रिया क्या है और इस्लाम में अंतिम सफर किन चरणों से होकर गुजरता है।

क्या है सुपुर्द-ए-खाक का अर्थ

सुपुर्द-ए-खाक शब्द फारसी और उर्दू भाषा से आया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'मिट्टी के हवाले कर देना'। इस्लाम धर्म में किसी व्यक्ति के निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान और विधिवत तरीके से दफनाने की क्रिया को सुपुर्द-ए-खाक कहा जाता है। यह प्रक्रिया केवल एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि एक अनिवार्य मजहबी दायित्व मानी जाती है जिसे पूरी गरिमा के साथ निभाया जाना चाहिए।

इस्लामी परंपरा में अंतिम संस्कार के मुख्य चरण

इस्लाम में किसी के निधन के उपरांत पूरी प्रक्रिया को शरीयत के कड़े नियमों के तहत अंजाम दिया जाता है। इसके मुख्य पड़ाव इस प्रकार हैं:

  • गुस्ल (स्नान): किसी भी मुसलमान के देहांत के बाद सबसे पहला कार्य उनके शरीर को पाक करना होता है। इसे गुस्ल कहते हैं। इसमें साफ पानी से पूरे शरीर को स्नान कराया जाता है, ताकि दिवंगत व्यक्ति को पूरी पवित्रता के साथ खुदा के समक्ष पेश किया जा सके। यह कार्य परिवार के करीबी लोग या अनुभवी व्यक्ति संपन्न करते हैं।
  • कफन पहनाना: गुस्ल के बाद शरीर को एक साधारण सफेद कपड़े में लपेटा जाता है, जिसे कफन कहते हैं। इस्लाम में सादगी पर अत्यधिक जोर दिया गया है, इसलिए कफन में किसी भी प्रकार की सजावट या दिखावे की मनाही है। अमीर हो या गरीब, सभी के लिए यही एक समान नियम है।
  • जनाजे की नमाज: कफन के बाद शव को मस्जिद या किसी खुले मैदान में ले जाया जाता है, जहां 'सलात-उल-जनाजा' पढ़ी जाती है। यह एक विशेष नमाज है जिसमें आम नमाजों की तरह रुकू या सज्दा नहीं होता। इसमें मृतक की आत्मा की शांति, गुनाहों की माफी और जन्नत में ऊंचे मुकाम के लिए प्रार्थना की जाती है।
  • दफन की रस्म: नमाज के बाद शव को कब्रिस्तान ले जाया जाता है। इस्लाम में कोशिश रहती है कि निधन के बाद जल्द से जल्द दफन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। शव को कब्र में इस तरह लिटाया जाता है कि चेहरा किबला यानी मक्का की दिशा की ओर हो। अंत में कब्र को मिट्टी से भर दिया जाता है।

अंतिम संस्कार से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण सवाल

सुपुर्द-ए-खाक की प्रक्रिया को लेकर अक्सर लोगों के मन में कई प्रकार की शंकाएं होती हैं, जिन्हें इस्लामी विद्वान स्पष्ट करते हैं:

  • फूलों की रस्म: बुनियादी इस्लामी रस्मों में कब्र पर फूल चढ़ाना शामिल नहीं है। हालांकि, कई मुस्लिम देशों में लोग अपनी मोहब्बत और सम्मान प्रकट करने के लिए कब्र पर गुलाब की पंखुड़ियां डालते हैं। इसे एक स्थानीय रिवायत के रूप में देखा जाता है, जिसका तरीका अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकता है।
  • कब्र में कौन उतर सकता है: आमतौर पर परिवार के करीबी पुरुष सदस्य जैसे बेटा, भाई या पिता कब्र में उतरते हैं। यदि यह संभव न हो, तो कब्रिस्तान के अनुभवी लोग या दफन की रस्म में विशेषज्ञता रखने वाले व्यक्ति यह जिम्मेदारी निभाते हैं ताकि शरीर को पूरी सावधानी से रखा जा सके।
  • रात के समय दफन: इस्लामी शिक्षाओं के मुताबिक, यदि आवश्यक हो तो रात के समय भी दफन की रस्म की जा सकती है। हालांकि, दिन के उजाले में इसे करना बेहतर माना जाता है ताकि सभी प्रबंध आसानी से और सुव्यवस्थित ढंग से किए जा सकें।
  • कब्र पर जाना: इस्लाम में कब्र पर जाने या जियारत करने के लिए कोई निश्चित अवधि या तारीख तय नहीं है। कोई भी व्यक्ति किसी भी समय वहां जाकर मृतक के लिए दुआ कर सकता है या कुरान का पाठ कर सकता है।

सुपुर्द-ए-खाक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, परिवार के सदस्य और रिश्तेदार आपस में शोक व्यक्त करते हैं और आमतौर पर 3 दिन तक सांत्वना (ताजियत) का सिलसिला चलता है, जिसमें लोग परिवार को धैर्य रखने की शिक्षा देते हैं और मृतक के लिए मगफिरत की दुआ करते हैं।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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